Tuesday, May 31, 2016

शिवपुराण के ये 12 संकेत बताते हैं कि कब होने वाली है आपकी मौत

महादेव त्रिदेवों में से एक हैं। उन्हें देवताओं का भी देवता कहा जाता है। भगवान शिव को धर्म-ग्रंथों में महाकाल भी कहा जाता है।महाकाल का अर्थ है काल यानी मृत्यु भी जिसके अधीन हो। भगवान शिव जन्म-मृत्यु से मुक्त हैं। अनेक धर्म ग्रंथों में भगवान शंकर को अनादि व अजन्मा बताया गया है। भगवान शंकर से संबंधित अनेक धर्मग्रंथ प्रचलित हैं, लेकिन शिवपुराण उन सभी में सबसे अधिक प्रामाणिक माना गया है। शिवपुराण में भगवान शिव ने माता पार्वती को मृत्यु के संबंध में कुछ विशेष संकेत बताए हैं। इन संकेतों को समझकर यह जाना जा सकता है कि किस व्यक्ति की मौत कितने समय में हो सकती है।
इस प्रकार हैं संकेत –
1- शिवपुराण के अनुसार जिस मनुष्य को ग्रहों के दर्शन होने पर भी दिशाओं का ज्ञान न हो, मन में बैचेनी छाई रहे, तो उस मनुष्य की मृत्यु 6 महीने में हो जाती है।
2- जिस व्यक्ति को अचानक नीली मक्खियां आकर घेर लें। उसकी आयु एक महीना ही शेष जाननी चाहिए।

3- शिवपुराण में भगवान शिव ने बताया है कि जिस मनुष्य के सिर पर गिद्ध, कौवा अथवा कबूतर आकर बैठ जाए, वह एक महीने के भीतर ही मर जाता है। ऐसा शिवपुराण में बताया गया है।
4- यदि अचानक किसी व्यक्ति का शरीर सफेद या पीला पड़ जाए और लाल निशान दिखाई दें तो समझना चाहिए कि उस मनुष्य की मृत्यु 6 महीने के भीतर हो जाएगी। जिस मनुष्य का मुंह, कान, आंख और जीभ ठीक से काम न करें, शिवपुराण के अनुसार उसकी मृत्यु 6 महीने के भीतर हो जाती है।
5- जिस मनुष्य को चंद्रमा व सूर्य के आस-पास का चमकीला घेरा काला या लाल दिखाई दे, तो उस मनुष्य की मृत्यु 15 दिन के अंदर हो जाती है। अरूंधती तारा व चंद्रमा जिसे न दिखाई दे अथवा जिसे अन्य तारे भी ठीक से न दिखाई दें, ऐसे मनुष्य की मृत्यु एक महीने के भीतर हो जाती है।
6- त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) में जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन पंद्रह दिन से अधिक नहीं चलता। यदि किसी व्यक्ति के मुंह और कंठ बार-बार सूखने लगे तो यह जानना चाहिए कि 6 महीने बीत-बीतते उसकी आयु समाप्त हो जाएगी।

Sunday, May 29, 2016

मरते वक़्त रावण ने लक्ष्मण को बताई थी ये बड़े काम की 3 बातें,


जिस समय रावण मरणासन्न अवस्था में था, उस समय भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि इस संसार से नीति, राजनीति और शक्ति का महान् पंडित विदा ले रहा है, तुम उसके पास जाओ और उससे जीवन की कुछ ऐसी शिक्षा ले लो जो और कोई नहीं दे सकता। श्रीराम की बात मानकर लक्ष्मण मरणासन्न अवस्था में पड़े रावण के सिर के नजदीक जाकर खड़े हो गए।
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रावण ने कुछ नहीं कहा। लक्ष्मणजी वापस रामजी के पास लौटकर आए। तब भगवान ने कहा कि यदि किसी से ज्ञान प्राप्त करना हो तो उसके चरणों के पास खड़े होना चाहिए न कि सिर की ओर। यह बात सुनकर लक्ष्मण जाकर इस रावण के पैरों की ओर खड़े हो गए। उस समय महापंडित रावण ने लक्ष्मण को तीन बातें बताई जो जीवन में सफलता की कुंजी है।

1- पहली बात जो रावण ने लक्ष्मण को बताई वह ये थी कि शुभ कार्य जितनी जल्दी हो कर डालना और अशुभ को जितना टाल सकते हो टाल देना चाहिए यानी शुभस्य शीघ्रम्। मैंने श्रीराम को पहचान नहीं सका और उनकी शरण में आने में देरी कर दी, इसी कारण मेरी यह हालत हुई।

2- दूसरी बात यह कि अपने प्रतिद्वंद्वी, अपने शत्रु को कभी अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए, मैं यह भूल कर गया। मैंने जिन्हें साधारण वानर और भालू समझा उन्होंने मेरी पूरी सेना को नष्ट कर दिया। मैंने जब ब्रह्माजी से अमरता का वरदान मांगा था तब मनुष्य और वानर के अतिरिक्त कोई मेरा वध न कर सके ऐसा कहा था क्योंकि मैं मनुष्य और वानर को तुच्छ समझता था। मेरी मेरी गलती हुई।








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3- रावण ने लक्ष्मण को तीसरी और अंतिम बात ये बताई कि अपने जीवन का कोई राज हो तो उसे किसी को भी नहीं बताना चाहिए। यहां भी मैं चूक गया क्योंकि विभीषण मेरी मृत्यु का राज जानता था। ये मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती थी।


Saturday, May 28, 2016

Women Who Dare: Slacklining 800+ meters above sea level in heels

She’s the female world record holder, the woman who survived a car accident to rediscover herself, her physical and mental limits and, in the process, break records.
Faith Dickey, a 26 year old down to earth Texan, might be badass but not without fears. The beautiful inside-out she-daredevil who slacklines 800+ meters above sea level with effortless grace, whether barefoot or with high heels, admits that heights do indeed get to her sometimes , ”The height definitely scares me sometimes.” Says the professional slackliner ”If I’m exposed to height often I can get used to it but after a month break I am scared all over again. It’s very disorienting to be so high up on a thin line”.
Extreme sports is a field that’s dominated by men more often than not, but here’s an interview with the girl who took the slacklining world by storm and made nothing stop her.








Wednesday, May 25, 2016

विश्व में तेजी से लोग अपना रहे है हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति !

जहां एक आेर हिन्दू धर्म के केंद्र माने जाने वाले भारत में हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति को लेकर आये दिन बवाल मचा रहता है और इसके विस्तार पर भगवाकरण व सांप्रदायीकरण जैसे आरोप लगते हैं वहीं दूसरी आेर विश्व बडे तेजी से हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति अपनाती जा रही है । हिन्दुओं के एकदम विपरीत माने जाने वाले यहूदियों और ईसाईयों में भारतीय संस्कृति का अच्छा प्रभाव देखने को मिल रहा है ।
रूस, अमेरिका, इजराइल, आॅस्ट्रेलिया, जर्मनी और यूरोप जैसे आधुनिक देशो में लोग हिन्दू धर्म की वैज्ञानिकता से काफी प्रभावित हैं और दिन प्रतिदिन लोगों का इसपर विश्वास बढता जा रहा है ।
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विश्व के सबसे संपन्न देश जर्मनी ने जहां पहले ही सनातन हिन्दू धर्म की महत्ता समझ ली थी और भारतीय संस्कृति तथा संस्कृत भाषा के लिए अपने द्वारा खोल दिए थे वहीं अब रूस, इजराइल, अमेरिका जैसे देशों में भारतीय परंपराओं का प्रसार किया जा रहा है ।
वर्तमान में भारत के बाद यदि हिन्दू धर्म का कोई दूसरा केंद्र है तो अमेरिका ही है जिसका प्रमुख कारण अमेरिकन लोगोंका तेजी से हिन्दू परंपराओं को अपनाना है ।
योग मेडिटेशन हो या फिर ॐ, गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र का जाप, पश्चिमी जगत से बडी मात्रा में लोग इसे सीखने भारत आ रहे हैं । इसके साथ ही भारतीयों ने विश्वभर में केंद्र खोलकर इनसे पश्चिमी लोगों को परिचित कराना शुरू कर दिया है । वर्तमान में अकेले अमेरिका में ही हजारों योग केंद्र हैं जहां प्रतिदिन लोग बडी मात्रा में एकत्रित होते हैं ।
विश्व के सबसे व्यस्त क्षेत्र में गिने जाने वाले न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर में हर वर्ष बडे स्तर पर योग कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं ।
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हिन्दू परंपराओं के प्रति पश्चिम का ना ही मात्र आम जनमानस आकर्षित है अपितु नेताओं और प्रसिद्ध लोगो (सेलेब्रिटीजों) में भी इसका अच्छा खासा आकर्षण देखने मिल रहा है ।
जहां पहले पश्चिमी लोग हिन्दू परंपराओं को सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर ही धारण करते थे वहीं अब वो इसका खुलकर दिखावा करते हैं । हिन्दू धर्म में हाथ में बांधे जाने वाले कलावे को अब यहूदी ईसाई भी धारण कर रहे हैं ।
हॉलीवुड सेलेब्रिटीजों और भारत आने वाले पश्चिमी लोगों के हाथ में कलावा मिलना आम बात है । हॉलीवुड फिल्मों में भी अब बडे स्तर पर हिन्दू प्रतीकों का प्रयोग होने लगा है जिसे सकारात्मकता की नजर से देखा जाता है ।
हाल ही में हॉलीवुड के प्रख्यात कलाकार सिल्वेस्टर स्टेलोन भारत में अपने बेटे का हिन्दू परंपराओं से श्राद्ध करने आए थे । इसी तरह दक्षिण अफ्रीकन क्रिकेटर जोंटी रोड्स ने भी मानसिक शान्ति के लिए हिन्दू मन्दिरों में यज्ञ हवन किया । मात्र यही नहीं अपितु रोड्स भारत से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी बेटी का नाम भी ‘इंडिया’ रखा हुआ है ।
वर्तमान में विश्व की सबसे चर्चित मार्क जुकरबर्ग ने भी हाल ही में बताया था कि, कैसे जब वो एकदम निराश हो चुके थे तब उन्हें नैनीताल स्थित हिन्दू मन्दिर में आकर उर्जा मिली जिसके पश्चात् उन्होंने नित नई कामयाबी की ऊँचाइयाँ चढीं ।
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जुकरबर्ग को इस पवित्र मन्दिर में आने की सलाह भी एक और हस्ती स्टीव जॉब्स ने दी थी जो स्वयं भी हिन्दू परंपराओं से बहुत प्रभावित थे और वो स्वयं भी भारत आये थे । भारत आकर जॉब्स ने काशी हरिद्वार ऋषिकेश नैनीताल स्थित कई हिन्दू मन्दिरों के दर्शन किये थे और अाध्यात्मिकता का भरपूर लाभ उठाया था ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा के समय रूस की चर्चित गायिका ने भी हिन्दू धर्म के प्रति अपने आकर्षण के विषय में बताया था । मात्र यही नहीं अपितु उन्होंने पीएम मोदी से रूस में एक भव्य मन्दिर बनवाने की भी अपील की ।
अमेरिकन राजनीति में भी अब हिन्दुओं का काफी बोलबाला है । अमेरिका में उच्च पदों पर तो हिन्दू हैं ही इसके साथ ही अमेरिकी संसद में भी हिन्दुओं का प्रभाव बढ़ रहा है ।
एक सर्वे के अनुसार अमेरिका में हिन्दू सबसे ज्यादा शिक्षित और पढ़े लिखे हैं । संपन्नता और शिक्षा में अमेरिका का हिन्दू समाज यहूदियों और ईसाईयों को मीलों पीछे छोड़ता है ।
अमेरिका में बडे स्तर पर हिन्दू मन्दिरों और मठों का निर्माण किया जा रहा है । अमेरिका के पड़ोसी देश कनाडा में भी बड़ी मात्रा में हिन्दू समुदाय रहता है । कनाडा की राजनीति में भी हिन्दुओं का अच्छा प्रभाव है ।
इसी तरह ब्रिटेन में भी हिन्दुओं का अच्छा प्रभाव है । ब्रिटेन में हिन्दुओं की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, अब वहां हिन्दुओं को वोटबैंक की तरह भी लिया जाने लगा है ।
पिछले दिनों लंदन के स्थानीय चुनावों में हिन्दुओ को आकर्षित करने के लिए उम्मीदवारों ने हिन्दू प्रतीकों और प्रधानमंत्री मोदी के फोटो के साथ प्रचार भी किया था ।
आस्ट्रेलिया में भी योग और हिन्दू परंपराओं के प्रति लोगों में काफी आकर्षण देखा जा रहा है । जहां पहले इन देशों के ईसाई हिन्दू परंपराओं से कन्नी काटते थे और पिछडा समझते थे वहीं आज गर्व से वे उन्हें धारण कर रहे हैं ।
इजराइल और यहूदियों में हिन्दू धर्म का सबसे ज्यादा प्रभाव देखने मिल रहा है । यहां के यहूदी बडी मात्रा में भारत आते हैं और हिन्दू परंपराओं से जुडते हैं । अपने संप्रदाय के प्रति धरती पर सबसे ज्यादा कट्टर माने जाने वाले यहूदी बडे स्तर पर हिन्दू धर्म अपना रहे हैं ।

क्यों एक मुस्लिम बहुल देश ने चचेरे-ममेरे भाई-बहनों की शादी पर रोक लगाने का फैसला किया है?

दुनिया के कई देशों में यह आम प्रथा है, खासकर मुस्लिम बहुल देशों में. इसलिए जब ताजिकिस्तान ने इस पर रोक लगाने का फैसला लिया तो दुनिया का चौंकना स्वाभाविक था.
चीन, अफगानिस्तान, किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान के बीचों-बीच बसा ताजिकिस्तान मध्य एशिया का सबसे गरीब देश है. ऐसा दुर्लभ ही होता है कि इस देश की कोई घटना सारी दुनिया में चर्चा का विषय बन जाए. लेकिन बीती 13 जनवरी को यहां की संसद का एक फैसला अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में शामिल हुआ. यह फैसला था देश में कॉन्सेंग्युनियस विवाह (रक्त संबंधियों से विवाह) पर प्रतिबंध लगाना. दुनिया के कई देशों, विशेषकर मुस्लिम बहुल देशों में कॉन्सेंग्युनियस विवाह बहुत ही आम प्रथा है. इसीलिए जब मुस्लिम बहुल ताजिकिस्तान ने इस प्रथा पर रोक लगाने का प्रगतिशील फैसला लिया तो इसने दुनिया भर के कई लोगों को हैरत में डाल दिया.
ताजिकिस्तान ने यह फैसला लेते हुए माना है कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह से पैदा होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं. यहां के स्वास्थ्य विभाग ने 25 हजार से ज्यादा विकलांग बच्चों का पंजीकरण और उनका अध्ययन करने के बाद बताया है कि इनमें से लगभग 35 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो कॉन्सेंग्युनियस विवाह से पैदा हुए हैं. कॉन्सेंग्युनियस विवाह से पैदा होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग होने की संभावनाओं पर लंबे समय से चर्चा होती रही है. लेकिन यह चर्चा कभी भी इतने व्यापक स्तर पर नहीं हुई कि इस तरह के विवाहों पर प्रतिबंध लग सके.
ताजिकिस्तान ने यह फैसला लेते हुए माना है कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह से पैदा होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं.
दुनिया के लगभग एक-चौथाई हिस्से में आज भी कॉन्सेंग्युनियस विवाह आम हैं. इनमें एशिया, उत्तरी अफ्रीका, स्विट्ज़रलैंड, मध्यपूर्व, और चीन, जापान और भारत के कई हिस्से शामिल हैं. इन सभी जगहों पर कॉन्सेंग्युनियस विवाह के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं. मुख्यतः कॉन्सेंग्युनियस विवाह उसे कहा जाता है जब कोई व्यक्ति अपने चचेरे/ममेरे भाई/बहन या उससे भी निकट रक्तसंबंधी से शादी करे. दक्षिण भारत में कई जगह लड़कियों की उनके मामा से शादी होना भी कॉन्सेंग्युनियस विवाह का एक उदाहरण है.
कई देश ऐसे भी हैं जहां कॉन्सेंग्युनियस विवाह पर पूरी तरह प्रतिबंध तो नहीं है लेकिन, यह आंशिक रूप से प्रतिबंधित है. उदाहरण के लिए कई अमरीकी राज्यों में कॉन्सेंग्युनियस विवाह की अनुमति सिर्फ उन्हीं लोगों को दी जाती है जिनकी उम्र 65 वर्ष से अधिक हो या जो बच्चे पैदा करने में असमर्थ हों. इसी तरह कुछ देश ऐसे भी हैं जहां सिर्फ चिकित्सकीय जांच के बाद ही कॉन्सेंग्युनियस विवाह की अनुमति दी जाती है. जानकारों का मानना है कि इन सभी देशों में इस तरह के प्रतिबंध सिर्फ इसीलिए लगाए गए हैं ताकि बच्चों में होने वाले आनुवंशिक रोगों को रोका जा सके.
ब्रिटेन में पैदा होने वाले बच्चों में पाकिस्तानी मूल के कुल तीन प्रतिशत बच्चे होते हैं. लेकिन आनुवंशिक रोग के पीड़ित ब्रिटेन के कुल बच्चों में से 13 प्रतिशत पाकिस्तानी मूल के ही हैं.
ऐसे कई अध्ययन हुए हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि आम बच्चों के मुकाबले कॉन्सेंग्युनियस विवाह से होने वाली संतानों में आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं कई गुना ज्यादा होती हैं. कुछ समय पहले ही ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड में भी ऐसा एक अध्ययन किया गया था. ब्रैडफोर्ड में पाकिस्तानी मूल के लोगों का बड़ा रिहाइशी इलाका है. यहां की कुल आबादी में लगभग 17 प्रतिशत आबादी पाकिस्तानी मुस्लिम लोगों की है. इन लोगों में से 75 प्रतिशत लोग अपने ही समुदाय में चचेरे/ममेरे भाई/बहनों से शादियां करते हैं. अध्ययन में सामने आया था कि यहां रहने वाले बच्चों में से कई आनुवंशिक रोगों का शिकार हैं और इसका मुख्य कारण कॉन्सेंग्युनियस विवाह ही है. एक अन्य अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन में पैदा होने वाले बच्चों में पाकिस्तानी मूल के कुल तीन प्रतिशत बच्चे होते हैं. लेकिन आनुवंशिक रोग के पीड़ित ब्रिटेन के कुल बच्चों में से 13 प्रतिशत पाकिस्तानी मूल के ही हैं.
दक्षिण भारत के कई इलाकों में भी कॉन्सेंग्युनियस विवाह का चलन है. यहां भी यह इस प्रथा के चलते बच्चों में कई तरह के रोग देखे जा सकते हैं. आंध्र प्रदेश की रहने वाली बिंदु शॉ इस विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय से रिसर्च कर रही हैं. वे बताती हैं कि भारत में अब तक ऐसे शोध न के बराबर ही हुए हैं जिनमें कॉन्सेंग्युनियस विवाह और उनके कारण होने वाले आनुवंशिक रोगों को साथ में परखा गया हो. कॉन्सेंग्युनियस विवाह के सामाजिक पहलुओं और आनुवंशिक रोगों के चिकित्सकीय पहलुओं पर अलग-अलग तो कई शोध हो चुके हैं लेकिन इन पर साथ में शोध करने वाली बिंदु शायद पहली भारतीय ही हैं.
'मैंने दो सौ ऐसे परिवारों पर अध्ययन किया है जिन्होंने कॉन्सेंग्युनियस विवाह किया था. इनमें से 97 परिवारों के बच्चे आनुवंशिक रोग से पीड़ित थे.'
बिंदु बताती हैं, 'मैंने दो सौ ऐसे परिवारों पर अध्ययन किया है जिन्होंने कॉन्सेंग्युनियस विवाह किया था. इनमें से 97 परिवारों के बच्चे आनुवंशिक रोग से पीड़ित थे. यह भी देखने में आया है कि चचेरे/ममेरे भाई/बहनों से हुई शादी की तुलना में मामा से शादी होने पर बच्चों में इस तरह के विकारों की संभावनाएं ज्यादा होती हैं.' वे आगे बताती हैं, 'जब भी कोई व्यक्ति अपने रक्तसंबंधियों से शादी करता है तो उनके कई जीन एक समान होते हैं. इस स्थिति में यदि उनके जीन में कोई विकार होता है तो उनके होने वाले बच्चे में ऐसे विकृत जीन की दो प्रतियां पहुंच जाती हैं. यही रोग का कारण बनता है. जबकि समुदाय से बाहर शादी होने पर जीन का दायरा बढ़ जाता है और इसलिए किसी विकृत जीन के बच्चों तक पहुंचने की संभावनाएं काफी कम हो जाती हैं.'
रिसर्च के लिए यह विषय चुनने के बारे में बिंदु बताती हैं, 'मैं जब स्कूल में पढ़ती थी तब से ही इस विषय में मेरी रुचि रही है. हमारे समाज में यह प्रथा आम है और मेरे कई रिश्तेदार इसके चलते आनुवंशिक रोगों का शिकार हुए हैं. इसलिए मैं हमेशा से इस विषय पर रिसर्च करना चाहती थी.' कॉन्सेंग्युनियस विवाह के कई दुष्परिणामों को जानने के बाद भी क्या यह प्रथा सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के चलते ही जारी है? इस सवाल के जवाब में बिंदु कहती हैं, 'मुझे लगता है कि धार्मिक मान्यताओं से ज्यादा सामाजिक पहलुओं के चलते लोग आज भी कॉन्सेंग्युनियस विवाह करते हैं. लोग मानते हैं कि अपने ही संबंधियों से शादी होने पर संपत्ति बाहर नहीं जाएगी और उसका बंटवारा नहीं होगा. इसके साथ ही लड़कियों के माता-पिता अपनी बेटी किसी अजनबी को सौंपने से बेहतर अपने किसी रिश्तेदार को सौंपना ही समझते हैं. विशेष तौर से ग्रामीण इलाकों में इस तरह की शादियों को ही ज्यादा वरीयता दी जाती है.'
कॉन्सेंग्युनियस विवाह को सही ठहराने वाले अक्सर यह तर्क देते हैं कि ऐसे विवाहों से होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग की संभावनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर दर्शाया जाता है.
कॉन्सेंग्युनियस विवाह जिन समुदायों में प्रचलित है उनमें कई बार प्रेम संबंधों के चलते भी इस तरह के विवाह होते हैं. बिंदु बताती हैं, 'बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही अपने चचेरे/ममेरे भाई-बहनों से मिलते हैं, उनके साथ खेलते हैं और साथ ही बड़े होते हैं. ऐसे में उनकी आपसी दोस्ती बहुत अच्छी होती है और जब उन्हें इस संभावना का पता होता है कि उनकी शादी हो सकती है तो यह दोस्ती प्रेम संबंधों में भी बदल जाती है.' इन तमाम पहलुओं के अलावा धार्मिक मान्यताओं को भी कई लोग कॉन्सेंग्युनियस विवाह का एक मुख्य कारण मानते हैं.
कॉन्सेंग्युनियस विवाह को सही ठहराने वाले अक्सर यह तर्क देते हैं कि ऐसे विवाहों से होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग की संभावनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर दर्शाया जाता है. ताजिकिस्तान में लिए गए हालिया फैसले का विरोध करने वाले भी यही मांग कर रहे हैं कि इस तथ्य की पुष्टि के लिए ज्यदा आंकड़े प्रस्तुत किये जाएं कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह ही आनुवंशिक रोगों का बड़ा कारण है. इन लोगों का तर्क है कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह से होने वाले बच्चों के बीमार होने की उतनी ही संभावनाएं होती हैं जितनी किसी 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिला के माँ बनने पर उसके बच्चे के बीमार होने की होती हैं. ताजिकिस्तान संसद के फैसले का विरोध करते हुए यह लोग सवाल कर रहे हैं कि जब किसी 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिला को मां बनने से नहीं रोका जाता तो फिर कॉन्सेंग्युनियस विवाह करने वालों पर रोक क्यों लगाई जानी चाहिए?
लेकिन चिकित्सा विज्ञान को समझने वाले जानकार मानते हैं कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह को धार्मिक या सांस्कृतिक नज़रिए से नहीं बल्कि चिकित्सकीय नज़रिए से परखा जाना जरूरी है और इस लिहाज़ से ताजिकिस्तान के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए.

Friday, May 20, 2016

क्‍या आप जानते हैं, भगवान राम की एक बहन भी थी?

क्‍या आप जानते हैं, भगवान राम की एक बहन भी थी? इस सवाल को पढ़कर शायद आप चौंक गये होंगे, क्योंकि बचपन से जो रामचरित मानस आपने पढ़ी या टीवी पर रामायण धारावाहिक देखा या फिर दादा-दारी, मम्मी-पापा ने जो रामायण के बारे में बताया उसमें तो कहीं भी भगवान राम की बहन का जिक्र नहीं था, तो आज कहां से यह बात छिड़ गई। तो हम आपको पहले ही बता दें, कि यह बात हम आपको बताने जा रहे हैं, रामायण के अलग-अलग स्वरूप से एकत्र किये गये तथ्यों के आधार पर। अगर दक्षिण की रामायण की मानें तो भगवान राम को मिलाकर चार भाई थे- राम, भरत, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न और एक बहन, जिनका नाम शान्ता था। शान्ता चारों भाईयों से बड़ी थीं। दक्षिण में लिखी गई रामायण में ऐसा लिखा गया है कि राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के थोड़े ही दिन के बाद उन्हें अंगदेश के राजा रोमपद ने गोद ले लिया था। भगवान राम की बड़ी बहन का पालन पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्शिनी (महारानी कौशल्या की बहन) ने किया। आगे चलकर शान्ता का विवाह ऋष्याश्रिंगा से हुआ। ऐसा माना जाता है कि ऋष्याश्रिंगा और शान्ता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। आज भी सेंगर राजपूत ही हैं, जिन्हें ऋषिवंशी राजपूत कहा जाता है।

भगवान राम की बड़ी बहन से जुड़े तथ्‍य 1/9 प्राण जायें पर वचन न जाये आपने यह बात जरूर सुनी होगी, "रघुकुल रीति सदा चली आये, प्राण जायें पर वचन न जाये।" जी हां इसी रीति की वजह से आज लोग शान्‍ता को नहीं जानते हैं। असल में महारानी कौशल्‍या की बहन वर्शिनी ने मजाक-मजाक में राजा दशरथ से उनकी बेटी मांग ली। वर्शिनी के कोई संतान नहीं थी, राजा दशरथ ने उनकी बात मान ली और फिर अपना वचन पूरी तरह निभाया। शान्‍ता आगे चलकर अंगदेश की राजकुमारी बनीं।

बहुत सुंदर थीं शान्‍ता भगवान राम की सुंदरता का बखान तो आपने रामायण में पढ़ा ही होगा, लेकिन कहा जाता है कि शान्‍ता उनसे भी कहीं अधिक सुंदर थीं। उन्‍होंने वेदों की शिक्षा ग्रहण की थी।

एक बार एक ब्राह्मण अपने क्षेत्र में फसल की पैदावार के लिये मदद करने के लिये राजा रोमपद के पास गया, राजा ने उसकी बात पर ध्‍यान नहीं दिया। अपने भक्‍त की बेइज्‍जती पर गुस्‍साये इंद्र देव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से सूखा पड़ गया। तब राजा ने ऋष्‍याश्रिंगा मुनि को यज्ञ करने के लिये बुलाया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्‍न का माहौल बन गया। तभी राजा दशरथ, कौशल्‍या, वर्शिनी और रोमपद ने अपनी बेटी शान्‍ता का हाथ ऋष्‍याश्रिंगा को देने का फैसला किया।

शान्‍ता के पति की वजह से पैदा हुए राम कहा जाता है कि शान्‍ता के बाद राजा दशरथ की कोई संतान नहीं थी। अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिये राजा दशरथ ने ऋष्‍याश्रिंगा को पुत्र कामेष्‍ठी यज्ञ करने के लिये बुलाया। उसी यज्ञ के बाद राम, भरत और जुड़वां लक्ष्‍मण और शत्रुघ्‍न पैदा हुए।

ऋषि मुनि के वेश में रहती थीं शान्‍ता बताया जाता है कि राजा दशरथ ने शान्‍ता को सिर्फ इसलिये गोद दे दिया था, क्‍योंकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्‍तराधिकारी नहीं बन सकती थीं। लेकिन जब पुत्रकामेष्‍ठी यज्ञ के दौरान उन्‍होंने ऋष्‍याश्रिंगा को बुलाया, तो उन्‍होंने शान्‍ता के बिना आने से इंकार कर दिया।

सुमंत लेकर आये थे शान्‍ता को कहा जाता है कि जब सूखा पड़ रहा था, तब सुमंत शान्‍ता को लेकर आये थे। जिस जिस स्‍थान पर शान्‍ता पैर रख रही थीं, उस-उस जगह पर सूखा समाप्‍त होता जा रहा था।

जनता को नहीं पता चलने दिया सत्‍यसाईं की कथा के अनुसार शान्‍ता ने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्‍या की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनके चित्र नहीं प्रस्‍तुत किये गये हैं।

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लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के बारे में वो बातें जो आप नहीं जानते

श्री रामायण को आजतक हमने अपने और इस समाज ने श्री राम की दृष्टिकोण से देखा; लक्ष्मण को देखा; देवी सीता को जाना; हनुमान के भक्ति भाव को जाना; रावण के ज्ञान को पहचाना, लेकिन कभी यह नही ध्यान दिया कि इस रामायण में अगर कोई सबसे अधिक उपेक्षित और अनदेखा पात्र था तो वो थीं लक्ष्मण की पत्नी और जनकनंदिनी सीता की अनुजा उर्मिला।

जब राम सीता वनवास को जाने लगे और बड़े आग्रह पर लक्ष्मण को भी साथ जाने की आज्ञा हुई तो पत्नी उर्मिला ने भी उनके साथ जाने का प्रस्ताव रखा परन्तु लक्ष्मण ने उन्हें यह कहकर मना कर दिया कि अयोध्या के राज्य को और माताओं को उनकी आवश्यकता है।

उर्मिला के उस नवयौवन कंधो पर इतना बड़ा दायित्व डाल कर लक्ष्मण चले गए। वो पल, वो जीवन सरिता जो कोई भी नववधू अपने पति के साथ गुजारती है, वो उर्मिला के नसीब में नहीं लिखी गयी थी। पतिव्रता स्त्री ने जीवन के चंचल पड़ाव पर भी, अपने पति से दूर रहने पर भी लेशमात्र भी किसी और का ध्यान नहीं किया।

सबसे विकट क्षणों में भी उर्मिला आंसू न बहा सकी क्योंकि उनके पति लक्ष्मण ने उनसे एक और वचन लिया था कि वो कभी आंसू न बहायेंगी, क्यूंकि अगर वो अपने दुःख में डूबी रहेंगी तो परिजनों का ख्याल नहीं रख पाएंगी।

ये कोई कल्पना कर सकता है की अपने पति को 14 वर्षो के लिए अपने से दूर जाने देना और उसकी विदाई पर आंसू भी न बहाना किसी नवविवाहिता के लिए कितना कष्टकारी हो सकता है? कितना हृदयविदारक पल था वो जब परम पूज्यनीय महाराज दशरथ स्वर्ग सिधार गए, पर वचन के सम्मान रखने के लिए उर्मिला तब
भी न रोईं।

महाराज जनक अपनी पुत्री को मायके अर्थात मिथिला ले जाना चाहते थे, ताकि माँ और सखियों के सान्निध्य में उर्मिला का पति वियोग का दुःख कुछ कम हो सके परन्तु उर्मिला ने मिथिला जाने से सादर इंकार कर दिया, ये कहते हुए कि अब पति के परिजनों के साथ रहना और दुखो में उनका साथ न छोड़ना ही अब उसका धर्म है।

चौदह वर्षों तक सोती रहीं बहुत से लोग इस बात से परिचित हैं कि अपने वनवास के दौरान भाई और भाभी की सेवा करने के लिए लक्ष्मण पूरे 14 साल तक नहीं सोए थे। उनके स्थान पर उनकी पत्नी उर्मिला दिन और रात सोती रहीं। लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि रावण की बेटे मेघनाद को यह वरदान प्राप्त था कि जो इंसान 14 वर्षों तक ना सोया हो केवल वही उसे हरा सकता है। निद्रा देवी को दिया था वचन इसलिए लक्ष्मण मेघनाद को मोक्ष दिलवाने में कामयाब हुए थे। रावण के अंत और 14 वर्ष के वनवास के पश्चात जब राम, सीता और लक्ष्मण वापस अयोध्या लौटे तब वहां राम के राजतिलक के समय लक्ष्मण जोर-जोर से हंसने लगे। सभी को ये बात बेहद आश्चर्यजनक लगी कि क्या लक्ष्मण किसी का मजाक उड़ा रहे हैं?
जब लक्ष्मण से इस हंसी का कारण पूछा तो उन्होंने जो जवाब दिया कि ताउम्र उन्होंने इसी घड़ी का इंतजार किया है लेकिन आज जब यह घड़ी आई है तो उन्हें निद्रा देवी को दिया गया वो वचन पूरा करना होगा जो उन्होंने वनवास काल के दौरान 14 वर्ष के लिए उन्हें दिया था। लक्ष्मण ने नहीं देखा भगवान राम का राजतिलक दरअसल निद्रा ने उनसे कहा था कि वह 14 वर्ष के लिए उन्हें परेशान नहीं करेंगी और उनकी पत्नी उर्मिला उनके स्थान पर सोएंगी। निद्रा देवी ने उनकी यह बात एक शर्त पर मानी थी कि जैसे ही वह अयोध्या लौटेंगे उर्मिला की नींद टूट जाएगी और उन्हें सोना होगा। लक्ष्मण इस बात पर हंस रहे थे कि अब उन्हें सोना होगा और वह राम का राजतिलक नहीं देख पाएंगे। उनके स्थान पर उर्मिला ने यह रस्म देखी थी। लक्ष्मण की विजय का कारण था उर्मिला का पतिव्रत एक और वाकया ऐसा है जो यह बताता है की लक्ष्मण की विजय का मुख्य कारण उर्मिला थी। मेघनाद के वध के बाद उनका शव राम जी के खेमे में था जब मेघनाद की पत्नी सुलोचना उसे लेने आयी, पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं।

रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- "सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाद का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। अब आप सोच में पड़ गये होंगे कि निद्रा देवी के प्रभाव में आकर अगर उर्मिला 14 साल तक सोती रहीं, तो सास और अन्य परिजनों की सेवा करने का लक्षमण को किया वादा उन्होंने कैसे पूरा किया। तो उसका उत्तर भी सीधा है। वो यह कि सीता माता ने अपना एक वरदान उर्मिला को दे दिया था। उस वरदान के अनुसार उर्मिला एक साथ तीन कार्य कर सकती थीं।

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Thursday, May 19, 2016

ISRO ने अपना खुद का मैप सॉफ्टवेयर 'भुवन' डिवेलप कर लिया है। जानिए गूगल मैप से कितना बेहतर है यह सॉफ्टवेयर...

उत्तराखंड से बीजेपी के राज्यसभा सांसद तरुण विजय ने हाल ही में 'देशभक्त भारतीयों' से गूगल मैप्स की जगह इसरो का डिवेलप किया हुई 'भुवन' मैप्स सॉफ्टवेयर प्रयोग करने की अपील की। हमारी मैप यूज करने की प्रॉसेस को गवर्न करने वाले 'जिओस्पेशल इन्फर्मेशन रेग्युलेशन बिल, 2016' के मसौदे पर बढ़ती बहस के बीच हम आपको बताते हैं कि किन 6 मायनों में गूगल मैप्स से अलग है भुवन।
मोबाइल ऐप: गूगल मैप से उलट मैप दिखाने के लिए भुवन का कोई मोबाइल ऐप नहीं है। यह मोबाइल ब्राउजर पर काम करता है। इसका 2डी मैप जल्दी लोड भी हो जाता है और रेजॉलूशन भी अच्छा है, वहीं 3डी मैप का रेजॉलूशन तो अच्छा है, लेकिन लोड होने में समय लेता है।

 

लोकेशन ट्रैकर: इसके लोकेशन ट्रैकर को इंप्रूव करने की जरूरत है। इस पर जब टाइम्स ग्रुप के दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु के ऑफिस सर्च किए गए तो कोई 'रिजल्ट नॉट फाउंड' का मुंह देखना पड़ा। दिल्ली ऑफिस मैन्युअली लोकेट किया जा सका।
 

लोकेशंस की लेबलिंग: भुवन के जरिए आप अभी नजदीकी ग्रॉसरी स्टोर या एटीएम न लोकेट कर पाएं, लेकिन इसके मोबाइल ऐप 'BhuvanPOI' में 'मैप योर नेबरहुड' का विकल्प है, जिसके जरिए यूजर एटीएम, बैंक और रेलवे स्टेशन जैसी कैटिगरीज के तहत लोकेशंस को कैप्चर करके उन्हें लेबल कर सकते हैं।


 


ट्रैफिक अपडेट: भुवन पर आपको ट्रैफिक अपडेट या नैविगेशन की सुविधा नहीं मिलेगी, जबकि डिजिटल मैप की जरूरत अक्सर इन्हीं वजहों से पड़ती है।


 

कुछ और सुविधाएं: भुवन कुछ दूसरी महत्वपूर्ण सुविधाएं (जैसे- मैपिंग फॉर डिजास्टर सर्विसेज, ओशन सर्विसेज, क्लाइमेट ऐंड इन्वाइरनमेंट) ऑफर करता है। सरकार का कहना है कि भुवन प्राथमिक रूप से सोशल बेनेफिट्स पर फोकस करता है और यह कोई कमर्शल वेंचर नहीं है।


लोकेशन शेयरिंग: इस सॉफ्टवेयर के जरिए कोई स्पेसिफिक लोकेशन शेयर करने का विकल्प भी नहीं नजर आया।     

इन 5 लोगों की वजह से गुलाम हुआ भारत, नहीं बन सका महाशक्ति

आज हम खुद को आजाद कहते हैं लेकिन जरा दिमाग पर जोर देकर सोचिए, क्या हम वाकई आजाद हैंं. बहरहाल इतिहास के पन्नों को उलटकर देखें तो भारत की गुलामी की एक नई कहानी निकलकर आती है जिसमें देश के दिग्गज शासकों और नवाबों ने अपने निजी स्वार्थों के चलते देश को धोखा दिया था, जिस वजह से देश को दशकों तक गुलामी की जंजीरों में रहना पड़ा और पिछड़ गया.
 


राजा जयचंद
अपनी निजी दुश्मनी के चलते राजा जयचंद ने पृथ्वीराज सिंह चौहान को मारने से भी गुरेज नहीं किया. जयचंद कन्नौज के राजा थे और दिल्ली के शासक पृथ्वीराज सिंह चौहान की बढ़ती प्रसिद्धि से काफी परेशान थे. इसके अलावा उनके पास पृथ्वीराज सिंह चौहान से नफरत करने की एक ओर वजह थी. उनकी बेटी संयोगिता और पृथ्वीराज दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे. जयचंद ने  पृथ्वीराज को सबक सिखाने के लिए विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गौरी से हाथ मिला लिया. जिसका नतीजा ये निकला कि तराइन के प्रथम युद्ध 1191 में बुरी तरह हारने के बाद मुहम्मद गौरी ने जयचंद की शह पर दोबारा 1192 में पृथ्वीराज सिंह चौहान को हराने और उन्हें मारने में सफल रहा.
 
राजा मानसिंह
मानसिंह मुगलों के सेना प्रमुख थे. राजा मान सिंह आमेर के कच्छवाहा राजपूत थे. महाराणा प्रताप और मुगलों की सेना के बीच लड़े गए भयावह और खूनी जंग (1576 हल्दी घाटी) में वे मुगल सेना के सेनापति थे. इस युद्ध में महाराणा प्रताप वीरतापूर्वक लड़ते हुए बुरी तरह घायल हो जाने के पश्चात् जंगलों की ओर भाग गए थे और जंगल में ही रहकर और मुगलों से बच-बचकर ही उन्हें पराजित करने और उनका राज्य वापस लेने के लिए संघर्ष कर रहे थे. लेकिन मानसिंह ने बड़ी चतुराई से उनका खात्मा करवाने में अहम भूमिका अदा की.
 
मीर जाफर
आधुनिक युग में लोग भले ही मीर जाफर को भूल चुके हैं लेकिन मीर जाफर नाम कभी किसी इंसान के लिए गद्दारी का पयार्य हुआ करता था. मीर जाफर बंगाल का पहला नवाब था जिसने बंगाल पर शासन करने के लिए हर तरह के हथकंड़े अपनाए थे. उसके राज को भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की शुरुआत माना जाता है. 1757 के प्लासी युद्ध में सिराज-उद-दौल्ला को हराने के लिए उसने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का सहारा लिया था. उसने विदेशी ताकतों को अपनी तरफ मिला लिया था. अपने निजी स्वार्थों के चलते जाफर ने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया था.
 
मीर कासिम
मीर कासिम सन् 1760 से 1763 के बीच अंग्रेजों की मदद से बंगाल का नवाब नियुक्त हुआ था. अपने अहंकार की लड़ाई में मीर कासिम ने देश का खासा नुकसान करवाया. इस पूरी लड़ाई में अगर किसी ने कुछ या सबकुछ खोया है तो वह हमारा भारतवर्ष ही है. मीर कासिम ने अंग्रेजों से बगावत करके 1764 में बक्सर का युद्ध लड़ा था, लेकिन ये लड़ाई सकारात्मक सिद्ध नहीं हो सकी और देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ता चला गया.
 
मीर सादिक
आपको याद होगा कि बचपन में हम टीपू सुल्तान को अपना नायक माना करते थे. जिन्होंने विदेशी ताकतों के नाक में दम कर रखा था, लेकिन वो कहते हैं न कि ‘जो कभी किसी से न हारा वो अपनों से हारा.  मीर सादिक टीपू सुल्तान के खास मंत्री थे लेकिन 1799 में टीपू सुल्तान को धोखा देकर अंग्रेजोंं का हाथ थाम लिया. इसके कारण अंग्रेज टीपू सुल्तान के किले पर कब्जा करने और टीपू सुल्तान को मारने में सफल रहे.
 
इन पांच लोगों के चलते देश धीरे-धीरे गुलामी की ओर बढ़ता रहा. अगर उस वक्त इन शासकों ने अपने निजी स्वार्थों को त्याग दिया होता तो देश न सिर्फ गुलामी की जंजीरों में कभी नहीं फंसता बल्कि आज महाशक्ति के रूप में विदेशी ताकतों से कहीं आगे होता

जलियाँवाला बाग क्या है?

1919 में जलियाँवाला बाग में भारी नरसंहार की वजह से भारतीय इतिहास में जलियाँवाला बाग एक प्रसिद्ध नाम और जगह बन गया। ये भारत के पंजाब राज्य के अमृतसर शहर में स्थित एक सार्वजनिक उद्यान है। भारत के पंजाब राज्य में शांतिप्रिय लोगों की याद में एक स्मारक बनाया गया है जो एक महत्वपूर्णं राष्ट्रीय स्थान के रुप में प्राख्यात है।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड क्या है?

जलियाँवाला बाग हत्याकांड या अमृतसर नरसंहार, वहाँ के लोगों के लिये एक बुरी घटना थी, जिसे आज भी पंजाब राज्य के अमृतसर में बने स्मारक के द्वारा भारत के लोगों के द्वारा याद किया जाता है। इसकी स्थापना पहली बार 1951 में उन लोगों को याद करने और श्रद्धांजलि देने के लिये हुई थी जिन्होंने ब्रिटिश शासन के सैनिकों द्वारा किये गये नरसंहार में अपने प्राणों की आहूती दे दी। इस दिन अर्थात् 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में पंजाबी नया साल कहलाने वाले पंजाबी संस्कृति के सबसे प्रसिद्ध उत्सव को मनाने के लिये काफी लोग शामिल थे।
जलियाँवाला बाग स्मारक
जलियाँवाला बाग स्मारक
*छवि स्रोत: wikipedia.org
औपनिवेशिक ब्रिटिश राज सूत्रों के द्वारा ये सूचित किया गया था कि लगभग 379 लोग मारे गये थे और 1100 लोग घायल हुए थे जबकि एक सिविल सर्जन (डॉ स्मिथ) के अनुसार, ये अनुमान लगाया गया कि 1526 लोग घायल हुए लेकिन सही आँकड़ों के बारे में आज भी पता नहीं है। लगभग 6.5 एकड़ अर्थात् 26,000 m2 क्षेत्र में स्थित जलियाँवाला बाग मैदान स्वर्ण मंदिर परिसर के पास है जो सिक्ख धर्म के लोगों के लिये बहुत ही पवित्र स्थान है।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड की जगह पर स्मारक बना है जो जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट के द्वारा देखभाल किया जाता है। जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट की धारा के मुताबिक वर्ष 1951 में भारतीय सरकार द्वारा इस स्मारक की स्थापना की गयी। उस नरसंहार में अपने जीवन की कुर्बानी देने वाले लोगों को श्रद्धांजलि देने और याद करने के लिये हर साल 13 अप्रैल को पूरे भारत के लोगों द्वारा जलियाँवाला बाग नरसंहार को याद किया जाता है।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड से संबंधित जानकारी:

स्थान: अमृतसर
तारीक: 13 अप्रैल 1919, 5:30 बजे शाम
लक्ष्य: हिन्दू, मुस्लिम और सिक्ख धर्म और राजनीतिक जनसमूह
प्रकार: नरसंहार
मौत: 379 से 1000
अपराधकर्ता: ब्रिटीश भारतीय सैनिक

जलियाँवाला बाग हत्याकांड (अमृतसर नरसंहार) क्यों जलियाँवाला बाग में घटित हुआ?

13 अप्रैल 1919 की रविवार की क्रांति को  रोकने के लिये जनरल डॉयर के द्वारा सभी सभाएँ पहले ही रोक दी गयी थी लेकिन ये खबर सभी जगह ठीक से नहीं फैलाई गई थी। ये बड़ा कारण था कि जिससे कि भीड़ अमृतसर के जलियाँलावा बाग में इकठ्ठा हुई और सार्वजनिक मैदान जो जलियाँवाला बाग कहलाता है, में जलियाँवाला बाग नरसंहार हुआ। 13 अप्रैल 1919 को सिक्ख धर्म के लोगों का बैशाखी उत्सव था। जलियाँवाला बाग में उत्सव को मनाने के लिये कई गाँवो की एक बड़ी भीड़ जमा हुई थी।
जैसे ही आर.ई.एच. डॉयर को जलियाँवाला बाग में सभा होने की खबर मिली, वो अपने 50 गोरखा बँदूकधारीयों के साथ वहाँ आ गया और भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। वो सैनिक 10 मिनट (1,650 राउँड) तक लगातार निर्दोष लोगों पर गोलियाँ चलाते रहें जबतक कि उनके जेब की सारी गोलियाँ खाली नहीं हो गयी।
ब्रिटेन में पूरे ब्रिटिश साम्राज्य का वो (डॉयर) हीरो बन गया हालाँकि हाउस ऑफ कॉमन्स के द्वारा उसकी काफी आलोचना हुई और जुलाई 1920 में उसे जबरदस्ती सेवानिवृत्त कर दिया गया। प्राणघाती नरसंहार एक बड़ा कारण बना उनकी सेना का पुनर्मूल्यांकन करने के लिये जिसके परिणाम स्वरुप न्यूनतम टुकड़ी की नई नीति आई जिसमें सैनिकों को बड़ी भीड़ को नियंत्रित करने का उचित तरीका बताया जाता था।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड का इतिहास

जलियाँवाला बाग हत्याकांड अमृतसर नरसंहार के रुप में भी प्रसिद्ध है क्योंकि ये पंजाब राज्य के अमृतसर शहर में घटित हुआ था। इसे भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान घटित हुआ भारतीय इतिहास के सबसे बुरी घटनाओं में से एक के रुप में माना जाता है। यह घटना 13 अप्रैल 1919 को घटित हुई, जब पंजाब के अमृतसर में जलियाँवाला बाग के सार्वजनिक मैदान में अहिंसक विद्रोहियों सहित जब एक आम लोगों (बैशाखी तीर्थयात्री) की बड़ी भीड़ जमा हुई थी। आम लोग (सिक्ख धर्म के) अपने सबसे प्रसिद्ध त्यौहार बैशाखी को मनाने के लिये इकट्ठा (कर्फ्यू घोषित होने के बावजूद भी) हुए थे जबकि ब्रिटिश सरकार के द्वारा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दो नेताओं (सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलूव) की गिरफ्तारी के खिलाफ अहिंसक विरोधकर्ता भी जमा हुए थे।
11 अप्रैल को जलंधर कैंटोनमेंट से जनरल डॉयर वहाँ पहुँचा था और नगर को अपने कब्जे में ले लिया था। उसने अपनी टुकड़ी को गोली चलाने का आदेश दिया जिससे 10 मिनट तक लगतार उसके सैनिक गोली चलाते रहें। वो बेहद आक्रामक रुप से गेट की ओर गोली चलाते रहे जिससे कोई भी उस जगह से बाहर नहीं निकल पाया और सभी सीधे गोलियों का निशाना बने। ये बताया गया था कि 370 से 1000 तक या उससे ज्यादा संख्या में लोगों की मौत हुई थी। ब्रिटिश सरकार की इस हिंसक कार्रवाही ने सभी को अचंभित और हैरान कर दिया। इस कार्रवाई के बाद लोगों का अंग्रेजी हुकुमत की नीयत पर से भरोसा उठ गया जो उन लोगों को 1920-1922 के असहयोग आंदोलन की ओर ले गया।
अमृतसर के जलियाँवाला बाग में पंजाब के लेफ्टिनेंट-गवर्नर को एक बड़ी क्रांति के होने की उम्मीद थी जहाँ 15000 से अधिक लोग उत्सव मनाने के लिये इकट्ठा हुए थे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोंलन के नेताओं की योजनाओं को दबाने और खत्म करने के लिये अमृतसर नरसंहार एक प्रतिक्रिया के रुप में थी। सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलूव नाम के दो प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं को छुड़ाने के लिये 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर के डिप्टी कमीशनर के आवास पर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं द्वारा विरोध और माँग हो रही थी ये गिरफ्तार किये गये वो नेता थे जिन्हें बाद में ब्रिटिश सरकार द्वार किसी गुप्त स्थान पर भेजने की योजना थी। इस विद्रोह में अंग्रेजी टुकड़ी द्वारा बड़ी भीड़ पर हमला किया गया था। सत्यपाल और सैफुद्दीन ने महात्मा गाँधी के सत्याग्रह आंदोलन में भी साथ दिया था।
11 अप्रैल को एक इंग्लिश मिशनरी शिक्षक, मिस मारसेला शेरवुड को भीड़ के द्वारा पकड़ कर पीटा गया था। हालाँकि बाद में उसे कुछ स्थानीय भारतीय और उसके छात्र के पिता द्वारा बचा लिया गया। अमृतसर शहर में क्रांति जारी थी जिसके दौरान रेलवे पटरी, सरकारी कार्यालय, इमारतें, टेलीग्राफ पोस्ट आदि को बुरी तरह से नुकसान पहुँचाया गया था। इस क्रांति के परिणाम स्वरुप, 13 अप्रैल को ब्रिटिश सरकार द्वारा पंजाब में मार्शल कानून घोषित कर दिया गया। इस दौरान नागरिकों के अधिकार, सभा करने की आजादी, भीड़ के इकट्ठा होने पर रोक (4 से ज्यादा लोगों को एक ही स्थान पर जुटने की मनाही) आदि पर पूरी तरह से कानून द्वारा पाबंदी लगा दी गयी थी।
उसी दिन अर्थात् 13 अप्रैल को ही सिक्ख धर्म के लोगों का एक पारंपरिक त्यौंहार बैशाखी था जिसके दौरान विभिन्न धर्मों के लोग जैसे हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख आदि अमृतसर के हरमिंदर साहिब के निकट जलियाँवाला बाग के सार्वजनिक उद्यान में इकट्ठा हुए थे। अभी सभा शुरु ही हुई थी कि जनरल डॉयर वहाँ अपने समूह के साथ आ पहुँचा जो 303 ली-इनफिल्ड बोल्ट एक्शन राइफल और मशीन गन के साथ थे, उसके सैनिकों ने पूरे मैदान को चारों तरफ से घेर लिया और बिना चेतावनी के गोलियाँ बरसानी शुरु कर दी गयी। बाद में क्रूर डॉयर ने सफाई देते हुए कहा कि ये कार्रवाई अवज्ञाकारी भारतियों को सजा देने के लिये थी जबकि वो भीड़ को तितर-बितर करने के लिये नहीं थी।
गोलियों की आवाज सुनने के बाद, लोग यहाँ-वहाँ भागने लगे लेकिन वो वहाँ से बच निकलने की कोई जगह नहीं पा सके क्योंकि वो पूरी तरह से ब्रिटिश सैनिकों से घिरा हुआ था। अपने आप को बचाने के लिये बहुत सारे लोग पास के ही कुएँ में कूद गये थे। बाद में इसी कुएँ से 120 लाशों को बाहर निकाला गया।

जलियाँवालाबाग हत्याकांड का प्रतिपुष्टी

इस घटना के होने के बाद, ब्रिटिश जनरल डॉयर ने क्रांतिकारी सेना के द्वारा अपने मुकाबले के बारे अपने वरिष्ठ अधिकारी को रिपोर्ट किया और उसके बाद एक टेलीग्राम के द्वारा लेफ्टीनेंट गवर्नर माईकल ओ ड्वायर के द्वारा घोषित किया गया कि “आपकी कार्रवाई सही थी और लेफ्टीनेंट गवर्नर ने इसे स्वीकार किया है”। ओ ड्वायर ने भी अमृतसर और उसके आस-पास के क्षेत्र में मार्शल कानून को जारी रखने का निवेदन किया था जिसे बाद में वॉयसरॉय चेम्सफोर्ड के द्वारा स्वीकृति दे दी गयी थी।
इसकी विंस्टन चर्चिल द्वारा आलोचना की गयी थी जिसके लिये उन्होंने 8 जुलाई 1920 को हाउस ऑफ कॉमन्स में बहस की थी। उन्होंने कहा कि:
लाठी को छोड़कर भीड़ के पास कोई हथियार नहीं था। किसी पर कहीं भी हमला नहीं हुआ था वहाँ जब उनको तितर-बितर करने के लिये उनपर गोलियाँ बरसायी गयी तो वो लोग इधर-उधर भागने लगे। ट्रैफेलगार स्क्वायर से भी काफी छोटी जगह पर उन्हें इकट्ठा किया गया जहाँ मुश्किल से ही कोई खड़ा हो सके तथा सभी एक साथ बँध से गये जिससे एक गोली तीन से चार लोगों को भेदती चली गयी, लोग पागलों की तरह इधर-उधर भागते रहें। जब गोली बीच में चलाने का निर्देश दिया गया तो सभी किनारे की ओर भागने लगे। उसके बाद गोली किनारे की ओर चलाने का निर्देश दिया गया। बहुत सारे जमींन पर लेट गये तो फिर गोली जमींन पर चलाने का निर्देश दे दिया गया। ये सिलसिला लगातार 10 मिनट तक चलता रहा और ये तब जाके रुका जब गोला-बारुद खत्म होने की कगार पर पहुँच गया।
हाउस ऑफ कॉमन्स में लंबी बहस के बाद, डॉयर के कृत्य की आलोचना हुई और उसके इस कार्रवाई के खिलाफ सदस्यों के द्वारा वोट किया गया। 22 मई 1919 को नरसंहार की खबर के बारे में जानकारी पाने के बाद रविन्द्रनाथ टैगोर के द्वारा कलकत्ता में ब्रिटिश शासन की इस अमानवीय क्रूरता के खिलाफ एक सभा आयोजित की गयी थी।
13 अप्रैल 1919 को घटित जलियाँवाला बाग नरसंहार का वास्तविक गवाह खालसा अनाथालय के उधम सिंह नाम का एक सिक्ख किशोर था। उधम सिंह ने लंदन के कैक्सटन हॉल में लेफ्टीनेंट गवर्नर माईकल ओ ड्वायर को मारने के द्वारा 1300 से ज्यादा निर्दोष देशवासियों की हत्या का बदला लिया जिसके लिये उसे 31 जुलाई 1940 में लंदन के पेंटनविले जेल में फाँसी पर चढ़ा दिया गया।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड के जवाब में हंटर कमीशन की स्थापना

पंजाब राज्य के जलियाँवाला बाग हत्याकांड की जाँच करने के लिये 14 अक्टूबर 1919 को भारतीय सरकार द्वारा एक कमेटी की घोषणा हुई। लार्ड विलियम हंटर (अध्यक्ष) के नाम पर हंटर कमीशन के रुप में इसका नाम रखा गया। बॉम्बे, दिल्ली और पंजाब में कुछ ही समय पहले हुई सभी घटनाओं के बारे में अच्छे तरीके से जाँच करने के लिये इस कमीशन की स्थापना हुई।
हालाँकि डॉयर की कार्रवाई के खिलाफ हंटर कमीशन कोई भी अनुशासनात्मक कार्रवाई को लागू करने में अक्षम साबित हुआ क्योंकि उसके वरिष्ठों के द्वारा उसे भुला दिया गया। लेकिन काफी प्रयास के बाद वो गलत पाया गया और 1920 में जुलाई महीने में समय से पहले सैनिक दबाव बनाकर सेवानिवृत कर दिया गया। डॉयर की क्रूर कार्रवाई के खिलाफ केन्द्रीय विधायी परिषद में पंडित मदन मोहन मालवीय ने भी अपनी आवाज उठायी थी। उनकी व्यक्तिगत जाँच के अनुसार उन्होंने दावा किया कि 15000 से 20000 के भीड़ में 1000 लोगों से ज्यादा की जानें गयी थी।
अमृतसर में 1919 में दिसंबर महीने में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के द्वारा एक वार्षिक सत्र को रखा गया और ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया गया कि “स्वप्रतिज्ञा के सिद्धांत के अनुसार भारत में एक पूर्णं जिम्मेदार सरकार की स्थापना के लिये जल्द कदम उठाये”। राजनीतिक कार्यवाही के लिये उनके प्रतिनिधि अंग के रुप में सिक्ख धर्म के लोगों द्वारा ऑल इंडिया सिक्ख लीग की स्थापनी की गयी। 1920-1925 के दौरान गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के द्वारा सिक्खों के पवित्र स्थान को सुधारने की उनकी माँग थी। बब्बर अकाली के रुप में कहा जाने वाला एक विपक्षी-ब्रिटिश आतंकवादी समूह बनाने के लिये कुछ सिक्ख सैनिकों द्वारा अपनी सेना की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। अकाली आंदोलन के नेताओं के द्वारा अहिंसा को स्वीकार किया गया।

जलियाँवाला बाग स्मारक की स्थापना

अमृतसर नरसंहार के बाद जलियाँवाला बाग तीर्थस्थान का एक राष्ट्रीय स्थल बन गया। शहीदों की याद में नरसंहार की जगह पर स्मारक बनाने के लिये मदन मोहन मालवीय ने एक कमेटी का निर्माण किया। स्मारक बनाने के लिये 1 अगस्त 1920 को 5,60,472 रुपये की कीमत पर राष्ट्र के द्वारा जलियाँवाला बाग को प्राप्त किया गया। हालाँकि स्मारक का निर्माण भारत की आजादी के बाद 9,25,000 रुपये में हुआ और उसका नाम “अग्नि की लौ” रखा गया जिसका उद्घाटन उसके घटने की तारीख दिन 13 अप्रैल को 1961 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के द्वारा किया गया।
हर किनारे पर खड़े पत्थर के लालटेन के साथ एक छिछले पानी में चार तरफ वाले लाल मतवाले किनारे पर पतली लंबाई के द्वारा घिरा हुआ मध्य में 30 फीट के ऊँचें स्तंभ के साथ स्मारक बना है। राष्ट्रीय प्रतीक के एक चिन्ह के रुप में अशोक चक्र के साथ ये 300 पट्टियों से बना है। स्मारक के चारों स्तंभों पर हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी और ऊर्दू में “13 अप्रैल 1919, शहीदों की याद में” लिखा हुआ है। जलियाँवाला बाग के मुख्य प्रवेश द्वार के बहुत पास एक बच्चों की स्वीमिंग पूल बनाने के द्वारा डॉयर के सैनिकों की अवस्था को चिन्हित किया गया है।

Wednesday, May 18, 2016

www.arvindshashwat.com: पर्सनल लाइफ में दखल उचित या अनुचित?

www.arvindshashwat.com: पर्सनल लाइफ में दखल उचित या अनुचित?: ताज या तख़्त या दौलत हो ज़माने भर की कौन सी चीज़ मोहब्बत से बड़ी होती है ! ज़िन्दगी प्यार की दो चार घड़ी होती है चाहे थोड़ी भी हो ये, उम्र...

पर्सनल लाइफ में दखल उचित या अनुचित?


ताज या तख़्त या दौलत हो ज़माने भर की
कौन सी चीज़ मोहब्बत से बड़ी होती है !
ज़िन्दगी प्यार की दो चार घड़ी होती है
चाहे थोड़ी भी हो ये, उम्र बड़ी होती है !!

राजेन्द्र कृष्ण के लिखे ये बोल इस धरती का सबसे बड़ा सच बयान करते हैं. प्रेम इस सृष्टि का सबसे बड़ा अनमोल धन है और कुदरत का दिया हुआ सबसे ज्यादा सुखकर उपहार है, जिसकी तलाश जन्म-जन्मांतर से हर जीव को है. हालांकि प्रेम की तलाश में दुःख-कष्ट भी बहुत झेलना पड़ता है, चाहे वो व्यक्ति विशेष के प्रति उत्पन्न सांसारिक प्रेम हो या फिर ईश्वर से होने वाला आध्यात्मिक प्रेम हो. इस ब्लॉग में व्यक्ति विशेष के प्रति उत्पन्न एक ऐसे सांसारिक प्रेम की चर्चा कर रहा हूँ, जिसने तेलंगाना के राज्‍य प्रशासन के सामने एक बहुत जटिल संकट खड़ा कर दिया है. तेलंगाना के मुख्‍यमंत्री के चंद्रशेखर राव की बेटी के कविता द्वारा गोद ली गई 18 वर्षीय लड़की सी प्रत्‍यूषा अपने से 10 साल बड़े 29 वर्षीय साइकिल मेकैनिक वेंकट रेड्डी से प्रेम करती है, जिसकी हैदराबाद में साइकिल की दुकान है. प्रत्‍यूषा उससे शादी करना चाहती है और इसके लिए अपनी नर्सिंग की पढ़ाई भी वो छोड़ने को तैयार है. प्रत्यूषा हैदराबाद में अपनी सौतेली मां रहती थीं, जो न सिर्फ उसका शोषण करती थी, बल्कि बुरी तरह से मारपीट भी करती थी. प्रत्यूषा के पडोसी एलबी नागर उसकी तकलीफ जब देखी न गई तो उन्होंने बाल अधिकारों से जुड़े संगठनों को इस बात की जानकारी दी.

मामले की जांच के बाद सत्यता पाये जाने पर प्रत्यूषा के माता-पिता को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और प्रत्‍युषा को उनके चंगुल से छुड़ाकर प्राइवेट अस्‍पताल में इलाज के लिए भर्ती कर दिया गया. उसके पूरे शरीर पर मारपीट के गहरे जख्म थे. इस पूरे मामले का राज्य के हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और प्रत्यूषा की जिम्मेदारी स्वयं ले ली. तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने भी उस समय घोषणा की थी कि वह प्रत्यूषा को गोद लेकर उसका भरण पोषण करेंगे. मुख्य्मंत्री के परिवार यानि उनकी बेटी के कविता ने प्रत्यूषा को गोद ले लिया. गोद लिए जाने के बाद जब प्रत्युषा को घर लाया गया तो उसने बातचीत के दौरान नर्स बनने की इच्छा जाहिर की. मुख्यमंत्री ने उससे पूरी सहानुभूति और सदासयता दिखाते हुए उसकी पढ़ाई का इंतजाम करने के साथ ही उसका बैंक अकाउंट खुलवाकर साढ़े छह लाख रुपये भी उसमे जमा करवा दिए, ताकि उसे पढ़ाई-लिखाई में कोई परेशानी न हो. प्राइवेट रूप से स्कूली परीक्षाएं पास करने के बाद उसे नर्सिंग के कोर्स में दाखिला मिल गया. प्रत्यूषा के पास दो बैडरूम का एक फ्लैट भी है, जो उसके पिता ने उसकी मां को तलाक दिए जाने के बाद मुआवजे के रूप में दिया था.

नर्सिंग की पढ़ाई के लिए जाने के दौरान ही प्रत्यूषा को हैदराबाद में साइकिल की दुकान पर काम करने वाले साइकिल मेकैनिक वेंकट से प्यार हो गया. अब प्रत्युषा नर्सिंग की पढ़ाई छोड़कर अपने प्रेमी वेंकट से जल्द से जल्द शादी करना चाहती हैं. प्रत्युषा के गार्जियन यानि अभिभावक की भूमिका एक ओर जहाँ आंध्रप्रदेश की हाईकोर्ट निभा रही है तो वहीँ दूसरी ओर तेलंगाना के मुख्य्मंत्री का परिवार. दोनों ही प्रत्युषा को मना रहे हैं कि वह अपनी पढ़ाई ना छोड़ें ओर अपना कैरियर बनाने पर ध्यान दे. अठारह वर्ष पूरे कर चुकी प्रत्युषा बालिग़ है और वो अपने फैसले पर अड़ी हुई है. हाईकोर्ट ने उसे अपने फैसले पर फिर से विचार करने के साथ ही तेलंगाना व आंध्रप्रदेश की पुलिस और सीआईडी से लड़के के संबंध में जांच कर यह पता लगाने को कहा है कि 29 साल का वेंकट नाम का लड़का प्रत्यूषा के लायक है या नहीं. बहुत से लोग कोर्ट के आदेश की तारीफ़ कर रहे हैं तो वहीँ दूसरी ओर बहुत से बुद्धिजीवी इसे व्यक्तिगत जीवन यानि पर्सनल लाइफ में दखल मान रहे हैं. वो कहते हैं कि कोर्ट में मुकदमों का अम्बार लगा है ओर कोर्ट अपना कीमती समय किसी की पर्सनल लाइफ में दखल देकर जाया कर रही है. कृपालु पाठकों, इस बारे में आपके क्या विचार हैं? अंत में फिर राजेंद्र कृष्ण के ये बोल-

दो मोहब्बत भरे दिल साथ धड़कते हो जहाँ
सबसे अच्छी वो मोहब्बत की घड़ी होती है !
ज़िन्दगी प्यार की दो चार घड़ी होती है
चाहे थोड़ी भी हो ये, उम्र बड़ी होती है !!

Tuesday, May 17, 2016

मोदी सरकार का सरदर्द बना 'विजय माल्या'

आपको यूपीए सरकार की दुर्गति तो याद ही होगी, जब उसके खिलाफ 'जी' घोटालों की एक सीरीज चल चुकी थी, जो २ जी, ३ जी, जीजा 'जी' और जाने क्या-क्या लेकर प्रचारित हुई और अंततः इसका खामियाजा कांग्रेस सरकार को भुगतना पड़ा. सवाल सरकार के खिलाफ माहौल बनने का है और नरेंद्र मोदी की सरकार को भी 'कॉर्पोरेट' को लेकर कुछ ज्यादा ही सावधानी बरतनी चाहिए. लोगों के मन में यह प्रश्न खूब उठ रहा है कि आखिर अपने खिलाफ शोर शराब होते देखकर विजय माल्या एयरपोर्ट से फरार कैसे हो गया? इस मामले में सरकार के लोग भी समय पर सक्रीय न होने को लेकर अपना सर पीट ही रहे होंगे! भारतीय शराब कारोबारी विजय माल्या को कौन नहीं जनता है, लेकिन इनको लोग अब बुरे रूप में याद रखने वाले हैं. 'किंग ऑफ़ गुड टाइम्स' अब 'बैड टाइम्स' में बदल चुका है. यह इसलिए कि आईपीएल में पैसो की हेराफेरी करनेवाले ललित मोदी की ही तरह माल्या भी फरार हो चुके हैं! और माल्या भी ललित मोदी की तरह लंदन में ही हैं. ललित मोदी को तो सरकार ला नहीं सकी अब देखना ये है कि माल्या को लाने में सफल होती है या नहीं! जाहिर हैं, लोगों की अपेक्षाएं इस मामले में बेहद घुली मिली होती हैं और वह बड़ी आसानी से आंकलन कर लेते हैं कि 'यह सरकार' भी मिली हुई हैं, अन्यथा वह भाग कैसे जाता? या फिर उसे वापस क्यों नहीं लाया जा सका हैं? विजय माल्या से पहले भी कई और डिफाल्टर हैं, जिसे ब्रिटेन ने शरण दी है और हमारी सरकार इस मामले में कारगर समझौते करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पायी है और पूरी प्रक्रिया बेहद जटिल हो चुकी है. बताते चलें कि गुलशन कुमार के हत्यारे से लेकर गुजरात बम धमाके से जुड़ा आरोपी भी लंदन में पनाह लिए हुए है. अब तक भारत से भाग कर लंदन में शरण लिए हुए लोगो में ललित मोदी, इंडियन नेवी वॉर रूम लीक केस का आरोपी रवि शंकरण, 1993 गुजरात बम धमाके का आरोपी टाइगर हनीफ, गुलशन कुमार हत्याकांड का आरोपी नदीम सैफी, गोवा में चाइल्ड अब्यूज का आरोपी रेमन्ड वार्ले, लॉर्ड सुधीर चौधरी और खालिस्तान मूवमेंट से रिलेटेड क्रिमिनल्स हैं.

जाहिर है, इन मामलों में बदलती परिस्थितियों के मद्देनज़र यह सोचना सरकार का ही काम है कि आखिर ब्रिटेन एक तरफ तो उससे दोस्ताना व्यवहार की उम्मीद करता है और वहीं दूसरी ओर उसके अपराधियों को बेझिझक शरण भी देता है. इस कड़ी में, भारत ने विजय माल्या को ब्रिटेन से डिपोर्ट करने का अनुरोध किया था, लेकिन ब्रिटेन के कानून के एक्सट्राडीशन ट्रीटी का आर्टिकल-9 के अनुसार वहां की सरकार ऐसा नहीं कर सकती है. इमीग्रेशन लॉ (1971) के मुताबिक, वह किसी भी आरोपी को तब तक ब्रिटेन में रहने से नहीं रोक सकती जब तक उसके पास वैलिड पासपोर्ट और वीजा है. ऐसे में, माल्या ने जब दो मार्च को देश छोड़ा था तब उनका पासपोर्ट वैध था, हालाँकि उनके जाने के बाद भारत सरकार ने उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया. लेकिन तकनीकी तौर पर इसका मतलब यह है कि वो जब ब्रिटेन पहुंचे तो उनका पासपोर्ट वैलिड था. हालाँकि, इस मामले में ब्रितानी सरकार 'संतुलन' की नीति अपनाए हुए है और यूके गवर्नमेंट ने भारत से कहा है कि वो माल्या के एक्सट्राडिशन की अर्जी (प्रर्त्यपण) औपचारिक रूप से पेश करें तो उस पर विचार किया जायेगा! गौरतलब है कि विजय माल्या भारतीय बैंकों के 9 हजार करोड़ का कर्जदार है. गिरफ़्तारी और मुसीबत से बचने के लिए माल्या ने सुप्रीम कोर्ट के सामने बैंकों से सेटलमेंट करने के लिए 6,868 करोड़ का ऑफर भी दिया था, जिसे बैंकों ने इंकार कर दिया था. इससे पहले माल्या ने 4,400 करोड़ का ऑफर देकर कहा था कि उनकी पत्नी और बच्चे NRI हैं, लिहाजा उनकी प्रॉपर्टी नहीं बताई जा सकती है. ऐसे में पूरा मामला पेचीदा होता जा रहा है और अब बात बैंकों के क़र्ज़ वसूलने से अलग हटकर विजय माल्या की गिरफ़्तारी और उसके प्रत्यर्पण पर टिक गयी है. जाहिर है, बैंकों के माध्यम से सरकार का जो धन डूबा, उसे वसूले जाने की उम्मीद क्षीण हो गयी है. यह मुख्य बात है, जो जनता में बेहद तेजी से फैलती है और सरकार के खिलाफ माहौल भी तैयार करती है. आंकड़ों के अनुसार देखें तो, 2002 के बाद से भारत अब तक 42 भगोड़ों की लिस्ट संबंधित देशों को सौंप चुका है. हालांकि, यूके से ट्रीटी होने बावजूद शायद ही किसी ऑफेन्डर को भारत सौंपे जाने का मामला सामने आया है. इस मामले में यही कहा जा सकता है कि अगर आरोपी रसूख वाला है तो ब्रिटेन का कानून उसकी पूरी मदद करेगा, क्योंकि छोटे क्राइम के लिए एक्सट्राडीशन की अपील या रिक्वेस्ट करने में देरी भी आरोपी को फायदा पहुंचा सकती है.

वहीं, यूके का ह्यूमन राइट्स एक्ट वहां के हर सिटीजन के 15 फन्डामेंटल फ्रीडम्स को प्रोटेक्ट करता है. वहां से किसी को डिपोर्ट तभी किया जा सकता है, बशर्ते संबंधित देशों में आरोपी के ह्यूमन राइट्स का वॉयलेशन न हो. हालाँकि, माल्या के लिए ईडी (एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट) नॉन-बेलेबल वारंट जारी कर चुका है और उसके लिए भी मामला इतना सरल नहीं है, किन्तु भारत न आने के लिए वह अपना पूरा ज़ोर लगा देगा, इस बात में दो राय नहीं! बताते चलें कि यूके में एंट्री करना, प्रॉपर्टी खरीदना और वहां सेटल होना रईस भारतीयों के लिए बेहद आसान है. यूके का होम डिपार्टमेंट, बिजनेस और अर्जेंट ट्रैवलर्स को 24 घंटे के अंदर सुपर प्रायोरिटी वीजा सर्विस ऑफर करता है. एक रिपोर्ट के अनुसार , एक आंत्रपेन्योर वीजा के लिए आपको 2 करोड़ रुपए का इन्वेस्टमेंट शो करना होगा. वहीं, इन्वेस्टर वीजा हासिल करने के लिए 20 करोड़ रुपए का इन्वेस्टमेंट शो करना होगा. इसकी वैलिडिटी तीन साल तक के लिए रहती है, जिसे बढ़ाया भी जा सकता है. एक अन्य खबर के मुताबिक, लंदन के पॉश इलाके मेफेयर में तीन हजार इंडियन फैमिलीज की अपनी लग्जरी प्रॉपर्टीज हैं. जाहिर है मामला बेहद उलझाऊ है और अगर केस चली भी तो विजय माल्या बूढा होकर मर खप जायेगा और उसके साथ ही बैंकों की 9000 करोड़ की पूँजी भी डूब जाएगी! हालाँकि, माल्या की राज्यसभा से सदस्यता भी रद्द कर दी गई है, पर सवाल यही है कि यह सारी प्रिकॉशन पहले क्यों नहीं ली जाती है? क्या सरकारी विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहता है कि लोग विदेश भाग जाएँ और वह झूठ मूठ की मगजमारी करे? माल्या के इतने बैंकों को एक साथ चुना लगा कर बिना किसी की मदद के बाहर कैसे जा सकता था? माल्या ने साफ़ तौर पर यह भी कहा है कि फ़िलहाल उसका भारत लौटने का कोई इरादा नहीं है. यह भी बड़ा प्रश्न है कि यदि माल्या ने 1993 में ही ब्रिटेन की नागरिकता हासिल कर ली थी, तो उसे राज्यसभा की सदस्यता कैसे दी गई? क्या इस सम्बन्ध में कोई कानून है या फिर कानून में इतना झोल है कि उसका फायदा जब न तब कोई भी उठा ले! इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जब बैंकों को ये पता था कि माल्या की आर्थिक हालत ठीक नहीं है फिर भी उनको इतना बड़ा लोन कैसे मिल गया? माल्या ही नहीं और भी बहुत सारे उद्योगपति हैं जिनके लोन की राशि पुरे भारत को मिला कर किसानों को दिए गए लोन की राशि से भी अधिक है और इस लोन का अधिकांश भाग 'एनपीए (बैड लोन)' में बदलता जा रहा हैं! बिना सरकार के हाथ के कोई इतनी बड़ी रकम को चुकाए देश छोड़ कर कोई चला जाए तो उसे आप आसानी से हज़म नहीं कर सकते हैं! सवाल यही है कि अगर ऐसे कुछ और केस आ गए तो ईमानदारी के ढिंढोरे के बावजूद मोदी सरकार की साख खतरे में पड़ जाएगी और ऐसा नरेंद्र मोदी तो कतई नहीं चाहेंगे!