Monday, June 27, 2016

अनदेखी तस्वीरें भारत के आजादी की..!

हम आप को आज़ादी के समय की कुछ तस्वीरें दिखाने जा रहे हैं, जिन्हे देख कर आप समझ सकते हैं की हमारे देश को आज़ादी की क्या कीमत चुकानी पडी..
यहाँ कुछ आजादी की तस्वीरें ऐसी भी हैं जो शायद आपको मानसिक रूप से परेशान कर सकती हैं.
उनको दिखाने के लिए हम आपसे माफ़ी चाहते हैं किन्तु इस सत्य को आप तक पंहुचाना जरूरी था.
(कमज़ोर दिल वाले तस्वीरें न देखें आप को बिचलित कर सकती हैं)
तो देखिये भारतीय आजादी की तस्वीरें –
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1. आजादी की कीमत कुछ लोगों को अपना घर छोड़कर चुकानी पड़ी थी. बंटवारे के वक़्त हिन्दू लोग भारत आ रहे थे और मुस्लिम लोग पाकिस्तान जा रहे थे.

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2. यह ट्रेन बता रही है कि उस समय कुछ लोग आजादी का जश्न नहीं शौक मना रहे थे.

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3. पानी के रास्ते लोग भारत आते हुए.

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 4. आजादी की सुबह दिल्ली के लालकिले पर लोग आजादी की ख़ुशी मनाने के लिए इस तरह से इकठ्ठे हुए थे.

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5. आज हम खुश है कि भारत आजाद है लेकिन आजादी के समय कत्लेआम की यह तस्वीर बता रही है कि जाते-जाते अंग्रेज हमको कितना दर्द देकर गये थे.

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 6. एक व्यक्ति को मिला था भारत और दूसरे को पाकिस्तान मिला था.

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7.आजादी की कागजी कार्यवाही पूरी करते हुए, अंग्रेज लेकिन यहाँ से महात्मा गाँधी गायब हैं और यह खालीपन बता रहा है कि गांधी जी आजादी से खुश नहीं थे.

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8. इस आजादी के समय सबसे ज्यादा लूट महिलाओं की हुई थी. माँ के मुश्किल हो रहा था अपने मासूम बच्चों को जिंदा रखना.

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9. देखिये किस तरह से इंसान पलायन करने पर मजबूर था.

 

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10. उस समय जानवर बनना आसान था और इंसान बने रहना मुश्किल था.

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11.  आजादी से पहले जब विभाजन की खबर नहीं आई थी तब गांधी जी अली जिन्ना से मुलाकात कर लिया करते थे.

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12. जलियांवाला बाग़ की दर्दनाक घटना को भूलना मुमकिन नहीं है. तब यहाँ उपस्थित लोग आजादी के लिए ही बहस कर रहे थे.

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 13. आजादी के लिए संघर्ष करते हुए लोग.

 

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14 आजादी के लिए लॉर्ड माउंटबेटन से बातचीत करते महात्मा गाँधी.

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15. आजादी की ख़ुशी मनाते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू.
ये थी आजादी की तस्वीरें – जिनको  देख आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कुछ लोगों ने आजादी की क्या कीमत चुकाई थी. असल में आजादी के बाद तो कुछ लोगों को और ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा था जिसे हम भूल चुके हैं.

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Saturday, June 25, 2016

ऋषि-मुनियों द्वारा किए आविष्कार व उनके द्वारा उजागर रहस्यों को जिनसे आप भी अब तक अनजान होंगे –

भारत की धरती को ऋषि, मुनि, सिद्ध और देवताओं की भूमि पुकारा जाता है। यह कई तरह के विलक्षण ज्ञान व चमत्कारों से अटी पड़ी है। सनातन धर्म वेद को मानता है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने घोर तप, कर्म, उपासना, संयम के जरिए वेद में छिपे इस गूढ़ ज्ञान व विज्ञान को ही जानकर हजारों साल पहले ही कुदरत से जुड़े कई रहस्य उजागर करने के साथ कई आविष्कार किए व युक्तियां बताईं। ऐसे विलक्षण ज्ञान के आगे आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक होता है।
कई ऋषि-मुनियों ने तो वेदों की मंत्र-शक्ति को कठोर योग व तपोबल से साधकर ऐसे अद्भुत कारनामों को अंजाम दिया कि बड़े-बड़े राजवंश व महाबली राजाओं को भी झुकना पड़ा।





 महर्षि दधीचि

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महातपोबलि और शिव भक्त ऋषि थे। वे संसार के लिए कल्याण व त्याग की भावना रख वृत्तासुर का नाश करने के लिए अपनी अस्थियों का दान करने की वजह से महर्षि दधीचि बड़े पूजनीय हुए। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि
एक बार देवराज इंद्र की सभा में देवगुरु बृहस्पति आए। अहंकार से चूर इंद्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर चले गए। देवताओं ने विश्वरूप को अपना गुरु बनाकर काम चलाना पड़ा, किंतु विश्वरूप देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे देता था। इंद्र ने उस पर आवेशित होकर उसका सिर काट दिया। विश्वरूप त्वष्टा ऋषि का पुत्र था। उन्होंने क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए महाबली वृत्रासुर को पैदा किया। वृत्रासुर के भय से इंद्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ इधर-उधर भटकने लगे।
ब्रह्मादेव ने वृत्तासुर को मारने के लिए वज्र बनाने के लिए देवराज इंद्र को तपोबली महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियां मांगने के लिये भेजा। उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए तीनों लोकों की भलाई के लिए अपनी हड्डियां दान में मांगी। महर्षि दधीचि ने संसार के कल्याण के लिए अपना शरीर दान कर दिया। महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र बना और वृत्रासुर मारा गया। इस तरह एक महान ऋषि के अतुलनीय त्याग से देवराज इंद्र बचे और तीनों लोक सुखी हो गए।


 आचार्य कणाद

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कणाद परमाणुशास्त्र के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले आचार्य कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।



भास्कराचार्य

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आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।




आचार्य चरक

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‘चरकसंहिता’ जैसा महत्तवपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर की सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग जैसी बीमारियों के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर की।


 

भारद्वाज

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आधुनिक विज्ञान के मुताबिक राइट बंधुओं ने वायुयान का आविष्कार किया। वहीं हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक कई सदियों पहले ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र के जरिए वायुयान को गायब करने के असाधारण विचार से लेकर, एक ग्रह से दूसरे ग्रह व एक दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जाने के रहस्य उजागर किए। इस तरह ऋषि भारद्वाज को वायुयान का आविष्कारक भी माना जाता है।





कण्व

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– वैदिक कालीन ऋषियों में कण्व का नाम प्रमुख है। इनके आश्रम में ही राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला और उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था। माना जाता है कि उसके नाम पर देश का नाम भारत हुआ। सोमयज्ञ परंपरा भी कण्व की देन मानी जाती है।



कपिल मुनि

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भगवान विष्णु का पांचवां अवतार माने जाते हैं। इनके पिता कर्दम ऋषि थे। इनकी माता देवहूती ने विष्णु के समान पुत्र चाहा। इसलिए भगवान विष्णु खुद उनके गर्भ से पैदा हुए। कपिल मुनि ‘सांख्य दर्शन’ के प्रवर्तक माने जाते हैं। इससे जुड़ा प्रसंग है कि जब उनके पिता कर्दम संन्यासी बन जंगल में जाने लगे तो देवहूती ने खुद अकेले रह जाने की स्थिति पर दुःख जताया। इस पर ऋषि कर्दम देवहूती को इस बारे में पुत्र से ज्ञान मिलने की बात कही। वक्त आने पर कपिल मुनि ने जो ज्ञान माता को दिया, वही ‘सांख्य दर्शन’ कहलाता है।
इसी तरह पावन गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरने के पीछे भी कपिल मुनि का शाप भी संसार के लिए कल्याणकारी बना। इससे जुड़ा प्रसंग है कि भगवान राम के पूर्वज राजा सगर ने द्वारा किए गए यज्ञ का घोड़ा इंद्र ने चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के करीब छोड़ दिया। तब घोड़े को खोजते हुआ वहां पहुंचे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगाया। इससे कुपित होकर मुनि ने राजा सगर के सभी पुत्रों को शाप देकर भस्म कर दिया। बाद के कालों में राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या कर स्वर्ग से गंगा को जमीन पर उतारा और पूर्वजों को शापमुक्त किया।
 

पतंजलि

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आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर को रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है।


 

शौनक

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वैदिक आचार्य और ऋषि शौनक ने गुरु-शिष्य परंपरा व संस्कारों को इतना फैलाया कि उन्हें दस हजार शिष्यों वाले गुरुकुल का कुलपति होने का गौरव मिला। शिष्यों की यह तादाद कई आधुनिक विश्वविद्यालयों तुलना में भी कहीं ज्यादा थी।



महर्षि सुश्रुत

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ये शल्यचिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक
(सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है।
जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद, पथरी, हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे।



वशिष्ठ

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वशिष्ठ ऋषि राजा दशरथ के कुलगुरु थे। दशरथ के चारों पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने इनसे ही शिक्षा पाई। देवप्राणी व मनचाहा वर देने वाली कामधेनु गाय वशिष्ठ ऋषि के पास ही थी।




विश्वामित्र

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ऋषि बनने से पहले
विश्वामित्र क्षत्रिय थे। ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को पाने के लिए हुए युद्ध में मिली हार के बाद तपस्वी हो गए। विश्वामित्र ने भगवान शिव से अस्त्र विद्या पाई। इसी कड़ी में माना जाता है कि आज के युग में प्रचलित प्रक्षेपास्त्र या मिसाइल प्रणाली हजारों साल पहले विश्वामित्र ने ही खोजी थी।
ऋषि विश्वामित्र ही ब्रह्म गायत्री मंत्र के दृष्टा माने जाते हैं। विश्वामित्र का अप्सरा मेनका पर मोहित होकर तपस्या भंग होना भी प्रसिद्ध है। शरीर सहित त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का चमत्कार भी विश्वामित्र ने तपोबल से कर दिखाया।





महर्षि अगस्त्य

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वैदिक मान्यता के मुताबिक मित्र और वरुण देवताओं का दिव्य तेज यज्ञ कलश में मिलने से उसी कलश के बीच से तेजस्वी महर्षि अगस्त्य प्रकट हुए। महर्षि अगस्त्य घोर तपस्वी ऋषि थे। उनके तपोबल से जुड़ी पौराणिक कथा है कि एक बार जब समुद्री राक्षसों से प्रताड़ित होकर देवता महर्षि अगस्त्य के पास सहायता के लिए पहुंचे तो महर्षि ने देवताओं के दुःख को दूर करने के लिए समुद्र का सारा जल पी लिया। इससे सारे राक्षसों का अंत हुआ।



गर्गमुनि

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गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। ये गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के के बारे नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ। कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए थे।





बौद्धयन

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भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी, उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया।

Tuesday, June 21, 2016

ISRO ने तोड़ा अपना रिकॉर्ड, 26 मिनट में श्रीहरिकोटा से स्पेस पहुंचेंगे सैटेलाइट



इसरो ने लॉन्च किया पीएसएलवी-C34

अपनी 36वीं उड़ान में पीएसएलवी-C34 कार्टोसैट-2 श्रृंखला के 727.5 किलो के सैटेलाइट के साथ 19 दूसरे सैटेलाइटों को अंतरिक्ष में लॉन्च किया. इसरो ने 20 सैटेलाइटों को एक साथ लॉन्च करके अपने पहले 10 सैटेलाइटों के लॉन्चिंग के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है.
17 सैटेलाइट विदेशी, 3 देसी
पीएसएलवी-C34 की लॉन्चिंग सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से श्रीहरिकोटा में की गई. भारतीय समय के अनुसार पीएसएलवी C-34 की लॉन्चिंग 22 जून को सुबह 9 बजकर 26 मिनट पर की गई. पीएसएलवी सी-34 के 20 सैटेलाइटों में से 17 कमर्शियल सैटेलाइट हैं. यानी 17 सैटेलाइट दूसरे देशों के हैं जिन्हें भेजने के लिए इसरो ने उन देशों से फीस ली है. इसके अलावा दो सैटेलाइट देश के दो शिक्षा संस्थानों के हैं. इस लॉन्चिंग में एक सैटेलाइट कॉर्टोसैट 2 सीरीज का इसरो का अपना है.
सैटेलाइट के जरिये जमीन पर निगरानी
पीएसएलवी-C34 मिशन की लॉन्चिंग का मुख्य उद्देश्य कॉर्टोसैट 2 सीरीज के 727.5 किलोग्राम वजन का एक सैटेलाइट लॉन्च करना है. कॉर्टोसैट सैटेलाइट इसरो के अपने सैटेलाइट हैं और इन सैटेलाइटों का मुख्य मकसद धरती की हाई रिजॉल्यूशन इमेजरी तैयार करना है. कॉर्टोसैट में खास तरह के कैमरे लगे हैं जो भारत में जमीन पर होने वाले किसी भी वानस्पातिक या भूगर्भीय परिवर्तन को बारीकी से पहचान सकेगा. इस सैटेलाइट के जरिए भारत ये सही सही जान पाएगा कि यहां पर किस तरह के और कितने जंगल हैं.


इसरो के जरिये अब तक 57 विदेशी सैटेलाइट अंतरिक्ष में
नदियों के कटाव और पहाड़ों के उत्खनन के बारे में सटीक जानकारी भी इस सैटेलाइट के जरिए मिल पाएगी. कॉर्टोसैट के अलावा पीएसएलवी सी-34 मिशन में 19 सैटेलाइट और लॉन्च किए जा रहे हैं. इसरो के लिए इतने सैटेलाइट एक साथ लॉन्च करना अपने आप में रिकॉर्ड है. इससे पहले इसरो 2008 में 10 सैटेलाइट एक साथ लॉन्च किए थे. इसरो अबतक 57 विदेशी सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित कर चुकी है.




पीएसएलवी 34 मिशन में बाहरी देशों के जो सैटेलाइट भेजे जा रहे हैं वो इस प्रकार हैं:

इंडोनेशिया का LAPAN A-3
जर्मनी का BIROS
कनाडा का M3MSAT
यूएसए का स्काईसेट GEN 2-1
कनाडा का GHGSAT 3
यूएसए के 12 DOVE सैटेलाइट
एक सैटेलाइट गूगल का
इन सैटेलाइटों में स्काईसेट GEN 2-1 गूगल का सैटेलाइट है जिसको इमेजरी के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. इसके अलावा इस लॉन्चिंग में चेन्नई की एक निजी यूनिवर्सिटी का सत्यभामा सैटेलाइट और पुणे के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग का स्वयंम सैटेलाइट है. स्वयंम सैटेलाइट को हैम रेडियो के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, वहीं सत्यभामा सैटेलाइट का इस्तेमाल वायुमंडल में होने वाले प्रदूषण के अध्ययन के लिए किया जाएगा.




Tuesday, June 7, 2016

ऐसे खत्‍म हो सकता है कश्‍मीर से आतंकवाद, बस मोदी उठा दें ये कदम..!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो साल के कार्यकाल में केंद्र सरकार की जम्मू-कश्मीर नीति कमोबेश कांग्रेस सरकार जैसी ही रही है। कांग्रेस की तरह बीजेपी भी वहां की क्षेत्रीय पार्टी, पीपुल्स डेमोक्रिटक पार्टी के साथ सत्ता सुख भोग रही है। इसके लिए बीजेपी ने पीडीपी को लिखित रूप में आश्वासन भी दिया है कि राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छे 370 को केंद्र की एनडीए सरकार जस का तस बनाए रखेगी यानी उससे कोई छोड़छाड़ नहीं की जाएगी।
ज़ाहिर है, खुदको घोर राष्ट्रवादी पार्टी मानने वाली बीजेपी ने फ़िलहाल कश्मीर में सत्ता सुख के लिए अपने सबसे अहम् एजेंडे को ठंडे बस्ते में डाल दिया। अब बीजेपी कह रही है, जब भारतीय संसद में दो तिहाई बहुमत मिलेगा, इस मसले को तब देखेंगे।
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दरअसल, लोकसभा में चुनाव प्रचार के दौरान जम्मू की रैली में मोदी ने ही धारा 370 पर कम से कम बहस करने की बात कही थी। उस समय राष्ट्रवाद के पैरोकार उम्मीद करने लगे थे कि सत्ता में आने के बाद मोदी इस एजेंडे पर काम करेंगे। मोदी ने शुरुआत भी अच्छी की थी। उधमपुर के लोकसभा सदस्य डॉ. जीतेंद्र सिंह को पीएमओ में राज्यमंत्री बना दिया था और डॉ. जीतेंद्र धारा 370 पर बहस की बात करने लगे थे, तब भी लगा थी कि मोदी परंपरा से हटकर कोई क़दम उठाएंगे, लेकिन दो साल बाद हालात एकदम अलग हैं। बहस तो दूर बीजेपी ने पीडीपी को लिखकर दे दिया है कि यह मसला जस का तस रहेगा। यही तो कांग्रेस करती आ रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी अपने पूरे कार्यकाल के दौरान इस बात पर अफ़सोस करते रहे कि बहुमत न होने के कारण धारा 370 को पर कोई फ़ैसला नहीं ले पा रहे हैं। कम से कम ऐसी शिकायत मोदी को नहीं है, क्योंकि उनके पास लोकसभा में 280 सीट का अच्छा बहुमत है। देश की जनता ने मोदी को बहुमत और एनडीए को 336 लोकसभा सदस्यों की शक्ति देकर यह संदेश दिया है कि भारत में सभी राज्यों को बराबर कर दीजिए। लिहाज़ा, मोदी के सत्ता में आते ही लोग धारा 370 को ख़त्म करने की चर्चा करने लगे थे।
यह सच है कि धारा 370 ख़त्म करने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत यानी लोकसभा में 367 सीट और राज्यसभा में 164 सीट की ज़रूरत है। यह काम केंद्र नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास दो तिहाई बहुमत न तो लोकसभा में है न ही राज्यसभा में। लेकिन, चूंकि मोदी ने ख़ुद चुनाव प्रचार के दौरान धारा 370 के औचित्य पर सवाल उठाया था और उन्हें उसी मुद्दे उन्हें जनादेश मिला था। लिहाज़ा, कम से कम सरकार को इस मुद्दे पर संसद में बहस की पहल तो करनी चाहिए थी। ताकि पूरा देश सुनता कि उनके क़ानून-निर्माता किसी राज्य विशेष को स्पेशल स्टैटस देने के बारे में क्या सोच रखते हैं।
अगर कश्मीर में मौजूदा हालात पर बात करें तो एनआईटी का विवाद थम गया है, पर आतंकी वारदात और सीमापार से घुसपैठ बढ़ रही हैं। धीरे-धीरे घाटी में आतंकवाद की फिर से वापसी होती नज़र आ रही है। हैरानी की बात है कि यह घोर राष्ट्रवादी कहे जाने वाले प्रधानमंत्री के रिजिम में हो रहा है। इस बात में दो राय नहीं कि कश्मीर समस्या और आतंकवाद तब तक यथावत रहेगा, जब तक कठोर फ़ैसला लेते हुए विशेष राज्य का दर्जा देने वाले धारा 370 ख़त्म नहीं कर दी जाती। वाक़ई अगर कश्मीर समस्या सदा के लिए हल करना है तो भारतीय संसद को ज़बरदस्ती इस धारा को स्क्रैप कर देना चाहिए।
कई लोग आशंकित रहते हैं कि इसे ख़त्म करने से बवाल हो सकता है। यह महज़ भ्रांति है, क्योंकि राज्य में जितने लोग इस धारा के समर्थक हैं, उससे ज़्यादा इसके विरोधी। इसलिए, अगर संसद इसे ख़त्म करने का प्रस्ताव पारित करती है, तो बहुत होगा, मुट्ठी भर लोग श्रीनगर की सड़कों पर निकलेंगे। इस तरह का विरोध तो यहां 26-27 साल से आए दिन हो रहा है। एक और विरोध प्रशासन झेल लेगा, जैसे 8 अगस्त 1953 को तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को कथित तौर पर कश्मीर को भारत से अलग करने की साज़िश रचने के आरोप में डिसमिस करके जेल में डाल देने पर विरोध ज़रूर हुआ था परंतु वह धीरे-धीरे शांत हो गया। ठीक इसी तरह धारा 370 ख़त्म करने पर विरोध होगा, लेकिन धीरे-धीरे शांत हो जाएगा और कम से कम एक नासूर की स्थाई सर्जरी तो हो जाएगी।
Indian Army Defused IED In Kashmir
कश्मीर का भूगोल ही ऐसा है कि वह स्वतंत्र देश के रूप में अपना अस्तित्व लंबे समय तक नहीं बनाए रख सकता। अगस्त 1947 में वह आज़ाद था, पर विभाजन के फ़ौरन बाद पाकिस्तान ने क़ब्ज़े के मकसद से कबिलाइयों के साथ हमला कर दिया और मुज़फ़्फ़राबाद व मीरपुर जैसे समृद्ध इलाकों पर क़ब्ज़ा कर लिया। कश्मीर पाकिस्तान से बचाने के लिए राजा हरिसिंह और शेख अब्दुल्ला ने दिल्ली का रुख किया। 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय के समझौते का बाद कश्मीर भारत का हिस्सा बना। मतलब, मान लीजिए, कश्मीर आज़ाद हो भी जाए, तो पाकिस्तान उसे आज़ाद नहीं रहने देगा। अगर पाकिस्तान से बच गया तो चीन घात लगाए बैठा है। जैसे तिब्बत पर क़ब्ज़ा कर लिया, वैसे ही कश्मीर पर क़ब्ज़ा कर लेगा। यानी कश्मीर का स्वतंत्र अस्तित्व फिज़िबल नहीं है।
यह तथ्य अलगाववादी और दूसरे नेता भली-भांति जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि कश्मीर भारत से अलग नहीं हो सकता। लिहाज़ा, अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए आज़ादी का राग आलापते रहते हैं। देश के पैसे पर पल रहे ये लोग इतने भारत को अपना देश मानते ही नहीं और दुष्प्रचार करते रहते हैं। इनकी पूरी कवायद धारा 370 अक्षुण्ण रखने के लिए होती है।
JKLF Chairman Yasin Malik Press Conference To Oppose Townships For Kashmiri Pandits
दरअसल, पिछले क़रीब सात दशक से सत्ता सुख भोगने वाले ये लोग इसे ख़त्म करना तो दूर इस पर चर्चा का भी विरोध करते हैं। बहस या समीक्षा की मांग सिरे से ख़ारिज़ करते हैं। सीएम मेहबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला आदि धमकी देते हैं कि अगर यह हटा तो कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा। इस बात में दो राय नहीं कि इस विकास-विरोधी प्रावधान को अब्दुल्ला-मुफ्ती जैसे सियासतदां और नैशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए बनाए रखना चाहती हैं, क्योंकि यह धारा उनकी सियासत को बनाए रखने का कारगर टूल बन गया है।
Kashmir chief minister Omar Abdullah spe
अगर कहा जाए कि इस सीमावर्ती राज्य की समस्या के लिए केवल पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ज़िम्मेदार हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। नेहरू की अदूरदर्शिता नतीजा आज पूरा मुल्क़ भुगत रहा है। धारा 370 का सबने कड़ा विरोध किया था, पर नेहरू अड़े रहे। ’अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता और मज़बूरी’ का हवाला देकर इसे लागू कराने में सफल रहे। नेहरू और शेख अब्दुला के बीच दिल्ली समझौते के बाद भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 का समावेश किया गया।
देश के स्वरूप पर आघात करने वाले इस प्रावधान का डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने पुरज़ोर विरोध किया था। 1952 में मुखर्जी ने नेहरू से कहा, “आप जो करने जा रहे हैं, वह नासूर बन जाएगा और किसी दिन देश को विखंडित कर देगा। यह प्रावधान उन लोगों को मज़बूत करेगा, जो कहते कि भारत एक देश नहीं, बल्कि कई राष्ट्रों का समूह है।“ आज घाटी में जो हालात हैं, उन्हें देखकर लगता है कि मुखर्जी की आशंका ग़लत नहीं थी?  धारा 370 के कारण ही राज्य मुख्यधारा से जुडऩे की बजाय अलगाववाद की ओर मुड़ गया। यानी देश के अंदर ही एक मिनी पाकिस्तान बन गया, जहां तिरंगे का अपमान होता है, देशविरोधी नारे लगाए जाते हैं और भारतीयों की मौत की कामना की जाती है।
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एक उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक़, डॉ. भीमराव आंबेडकर भी कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने ने शेख़ अब्दुल्ला को लताड़ते हुए साफ़ शब्दों में कह दिया था, “आप चाहते हैं, भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, वह आपके यहां सड़कें बनाए, आपको राशन दे और कश्मीर का वही दर्ज़ा हो जो भारत का है! लेकिन भारत के पास सीमित अधिकार हों और जनता का कश्मीर पर कोई अधिकार नहीं हो। ऐसे प्रस्ताव को मंज़ूरी देना देश के हितों से दग़ाबाज़ी करने जैसा है और मैं क़ानून मंत्री होते हुए ऐसा कभी नहीं करूंगा।“ तब अब्दुल्ला नेहरू से मिले जिन्होंने उन्हें गोपाल स्वामी आयंगर के पास भेज दिया। आयंगर सरदार पटेल से मिले और उनसे कहा कि वह इस मामले में कुछ करें क्योंकि नेहरू ने अब्दुल्ला से इस बात का वादा किया था और अब यह उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ गया है।
दरअसल, विशेष दर्जे के कारण राज्य में बेटियों के साथ घोर पक्षपात होता है। दूसरे राज्य के व्यक्ति से शादी करने पर वे स्टेट सब्जेक्ट यानी राज्य की नागरिकता खो देती हैं। कुपवाड़ा की अमरजीत कौर इस अमानवीय पक्ष की जीती जागती मिसाल हैं। गैर-कश्मीरी से शादी करने वाली अमरजीत को नागरिकता साबित करने और पैत्रृक संपति पर अधिकार साबित करने में 24 साल लग गए। दूसरे राज्य के पुरुष से शादी के बाद बेटियां नागरिक बनी रहेंगी या नहीं, इस मसले पर आज भी कोई साफ़ गाइडलाइन नहीं है।
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के 2002 के फ़ैसले के बाद धारा 370 की विसंगतियां प्रकाश में आईं। इसे बदलने की कोशिश तो दूर, राजनीतिक दलों ने इस पर चर्चा भी नहीं की। इसी मंतव्य के तहत सन् 2004 में विधानसभा में ‘स्थाई नागरिकता अयोग्यता विधेयक’ यानी परमानेंट रेज़िडेंट्स डिसक्वालिफ़िकेशन बिल पेश हुआ। इसका मकसद ही हाईकोर्ट का फैसला निरस्त करना था। यह बिल क़ानून नहीं बन सका तो इसका सारा श्रेय विधान परिषद को जाता है जिसने इसे मंज़ूरी देने वाला प्रस्ताव ख़ारिज़ कर दिया।

एक सच यह भी है कि केंद्र इस राज्य को आंख मूंदकर पैसे देता है, फिर भी राज्य में उद्योग–धंधा खड़ा नहीं हो सका। यहां पूंजी लगाने के लिए कोई तैयार नहीं, क्योंकि यह धारा आड़े आती हैं। उद्योग का रोज़गार से सीधा संबंध है। उद्योग नहीं होगा तो रोज़गार के अवसर नहीं होंगे। राज्य सरकार की रोज़गार देने की क्षमता कम हो रही है। क़ुदरती तौर पर इतना समृद्ध होने के बावजूद इसे शासकों ने दीन-हीन राज्य बना दिया है। यह केंद्र के दान पर बुरी तरह निर्भर है। इसकी माली हालत इतनी ख़राब है कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन का 86 फ़ीसदी हिस्सा केंद्र देता है। इतना ही नहीं इस राज्य के लोग पूरे देश के पैसे पर ऐश करते हैं।
दरअसल, धारा 370 को लागू करते समय नेहरू ने भरोसा दिया था कि यह अस्थायी व्यवस्था है, जो समय के साथ घिस–घिस कर ख़ुद समाप्त हो जाएगी, लेकिन यह घिसने की बजाय परमानेंट हो गई। अब पीडीपी और एनसी क्रमशः सेल्फ़रूल और ग्रेटर ऑटोनॉमी के ज़रिए कश्मीर को 1953 से पहले की पोज़िशन में लाने की वकालत करते हैं। वे इन मुद्दों को उछालकर कश्मीरी नेतृत्व संकेत देता है कि धारा 370 को टच मत करो।
ऐसे में यह कहना अतिरंजनापूर्ण कतई नहीं होगा कि मोदी ने चुनाव के दौरान यह मसला व्यापक राष्ट्रीय हित में उठाया था, लेकिन उस पर अमल नहीं किया। विशेषज्ञों का मानना है कि धारा 370 हटाने के बाद राज्य की 95 फ़ीसदी आबादी का विकास होगा जो अब तक मुख्यधारा से कटी हुई है क्योंकि सत्ता सुख भोगने वाले राजनेता अकेले ही अब तक सारी मलाई खाते रहे हैं।