Saturday, January 31, 2015
Friday, January 30, 2015
HC Seeks Govt’s Reply On PMO Using Facebook, Twitter
New Delhi: The Delhi High Court today sought the government’s response on a plea by former BJP leader K N Govindacharya objecting to opening of Facebook and Twitter accounts by PMO and other ministries in alleged violation of law.
A bench of Justice B D Ahmed and Justice Sanjeev Sachdeva granted three week’s time to the government and asked it to file the reply “positively” on the issue.
The court fixed the matter for further hearing on March 13.
Advocate Virag Gupta, appearing for Govindacharya, raised objection on usage of Facebook and Twitter for official purpose by several ministries through private e-mail accounts, saying it violates the Public Records Act as per which “no person shall take or cause to be taken out of India any public records without the prior approval of the central government”.
The counsel argued that servers of these social networking sites are outside India and so the country’s official data is transferred to other nations.
During the hearing, Additional Solicitor General Sanjay Jain, appearing for the Centre, said it had called a meeting of social media companies on January 23 and the issue is being examined.
The court was hearing a PIL filed by Govindacharya who that contended government departments are not entitled to creating accounts on social networking sites.
The PIL also sought recovery of taxes from the websites on their income from operations in India.
It alleged that the sites have no mechanism for protection of children from online abuse.
The PIL claimed that children below 18 years are entering into an agreement with the social networking sites to open accounts, which is against the Indian Majority Act, the Indian Contract Act and also the Information and Technology Act.

Thursday, January 29, 2015
Now You Can Write In Your Languege On Your Android Phone
Now You Can Write In Your Languege On Your Android Phone
Thursday, January 22, 2015
क्या अंग्रेजी बन गई है राष्ट्रभाषा ?
क्या अंग्रेजी बन गई है राष्ट्रभाषा?
आजादी के 63 बरस बीत जाने के बाद भी हिंदी इस देश में राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा सकी, अब भी यह सह राजभाषा के रूप में ही संघर्षरत है. जबकि हर ओर अंग्रेजी का बोलबाला है, सेना, सरकार, बाजार से लेकर शिक्षा और लोकाचार तक. तो क्या अघोषित तौर पर अंग्रेजी बन गई हमारी राष्ट्रभाषा-
खड़ी बोली खड़ी है. संसद के दरवाजे पर. ठिठकी, सहमी और सकुचायी सी. 63 साल हो गए. अंग्रेजी ने कुर्सी खाली नहीं की. सो खड़ी ही है. देश के सम्मानित नेताओं ने कहा था कि जबतक हिंदी कामकाज न संभाल ले, तबतक दोनों काम करें. हिंदी कामकाज संभाल ले तो उसे पूरी तरह कुर्सी दे दी जाएगी. इसकी समय सीमा भी तय हुई कि 1965 तक हिंदी राज का काज संभाल लेगी. और तब अंग्रेजी को मुख्य राजभाषा के पद से हटा कर हिंदी को मुख्य राजभाषा का दर्जा दे दिया जाएगा. ऐसा नहीं है कि इतने सालों में हिंदी कामकाज संभालने लायक नहीं हो पायी है. पर अंग्रेजी उसे काम करने कहां देती है. उसे एक कोने में समेट दिया गया है. सारा काम अंग्रेजी में. हिंदी में तो बस अनुवाद. बातें तो कुछ हिंदी में हो भी जाएं, काम अंग्रेजी में ही होता है. कुछ नाम मात्र के अपवाद को छोड़ दें तो संघ के समूचे कामकाज का यही हाल है.
रस्मी तौर पर हिंदी के नाम पर हो रहे कुछ कामों को छोड़ दें तो भारत सरकार का सारा कामकाज मुख्य राजभाषा के रूप में अंग्रेजी ही संभाल रही है. सनद रहे कि प्रथम-राजभाषा आयोग की सिफारिशों पर विचार करने और उस पर अपनी राय राष्ट्रपति को देने के लिए लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्यों की एक समिति संविधान के अनुच्छेद 344 के खंड (4) के उपबंधों के अनुसार गठित की गई थी. समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति के समक्ष 8 फरवरी, 1959 को पेश की. इसको स्वीकार करते हुए 27 अप्रैल, 1960 को जारी अपने आदेश में राष्ट्रपति ने कहा था- 'विभिन्न प्रादेशिक भाषाएं राज्यों में शिक्षा और सरकारी काम-काज के माध्यम के रूप में तेजी से अंग्रेजी का स्थान ले रही है. यह स्वाभाविक ही है कि प्रादेशिक भाषाएं अपना उचित स्थान प्राप्त करें.' राष्ट्रपति के आदेश में यह भी कहा गया था- 1965 तक अंग्रेजी मुख्य राजभाषा और हिन्दी सहायक राजभाषा रहनी चाहिए. 1965 के उपरान्त जब हिन्दी संघ की मुख्य राजभाषा हो जाएगी, तब अंग्रेजी सहायक राजभाषा के रूप में ही चलती रहनी चाहिए.
आदेश में साफ तौर पर यह भी कहा गया था कि संघ के प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी के प्रयोग पर कोई रोक इस समय नहीं लगाई जानी चाहिए और अनुच्छेद 343 के खंड (3) के अनुसार इस बात की व्यवस्था की जानी चाहिए कि 1965 के उपरान्त भी अंग्रेजी का प्रयोग इन प्रयोजनों के लिए, जिन्हें संसद् विधि द्वारा उल्लिखित करे तब तक होता रहे जब तक वैसा करना आवश्यक रहे.
इधर सरकार के एक बयान ने देश के हिंदी प्रेमियों को जोर का झटका धीरे से दिया. सवाल देश में हिंदी की संवैधानिक स्थिति और देश की राष्ट्रभाषा के बारे में था. यह सवाल संसद में सत्यव्रत चतुर्वेदी और मोती लाल बोरा ने उठाया था. बात 3 मार्च 2010 की है. इन दोनों नेताओं ने राज्यसभा में अपने अतारांकित प्रश्न संख्या 653 में पूछा कि क्या सरकार का ध्यान हाल ही में गुजरात उच्च न्यायालय के उस वक्तव्य की ओर गया है, जिसके अनुसार भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है और हिंदी अधिकारिक तौर पर राष्ट्रभाषा नहीं है और नहीं है, तो हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है? जवाब में गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने कहा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के संबंध में भारत के संविधान में कोई प्रावधान नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी संघ की राजभाषा है. पर आश्चर्य इस बात से हुआ कि इस पर किसी ने सरकार से यह नहीं पूछा कि इस देश को उसकी राष्ट्रभाषा कब मिलेगी. मिलेगी भी या नहीं. हिंदी की पक्षधर और उसी के सहारे व्यवसाय जमाने चमकाने वाली मीडिया भी इस बार मौन ही रही.
न सिर्फ हिंदी के अखबारों में अंग्रेजी शब्दों और रोमन लिपि का प्रयोग धड़ल्ले से होने लगा है, बल्कि हिंदी और अंग्रेजी के द्विभाषी अखबार भी प्रकाशित होने लगे हैं. ऐसे हिंदी अखबारों के संपादक इसके विनाशकारी खतरों की ओर ध्यान नहीं दे रहे. जब टेलीविजन पर अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा था तो तर्क दिया गया था कि उसकी पहुंच विदेशों में बैठे दर्शकों तक है, जो कठिन हिंदी समझ नहीं पाते. पर यूरोप जाएं, और वहां के टीवी चैनल को देखें. वे अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषा में सब टाइटल देने की जरूरत भी नहीं समझते.
भारतीय मीडिया का यह नया व्यवहार और अपनी ही भाषा हिंदी के प्रति यह भाव चिंतित करने वाला है. और वह भी तब है, जब देश भर में हिंदी अखबारों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है.
समाचार पत्र महापंजीयक की रिपोर्ट के अनुसार (अबतक यही आंकड़ा वेबसाइट पर उपलब्ध) 2004-2005 के दौरान देश में प्रकाशित दैनिकों की संख्या 1834 थी. जिनकी कुल प्रसार संख्या 7,86,89,266 प्रतियां थी. इनमें हिन्दी भाषा के दैनिको की संख्या 799 थी और उन्होंने 3,37,73,557 प्रतियों का और अंग्रेजी के 181 दैनिकों ने 1,07,71,169 प्रतियों के प्रसार का दावा किया था. इस तरह हिंदी पहले और अंग्रेजी दूसरे स्थान पर थी. भारत में संविधान की आठवीं अनुसूची में अंकित अंग्रेजी और 22 प्रमुख भाषाओं में समाचारपत्र पंजीकृत किए जाते हैं. साथ ही 100 अन्य भाषाओं, बोलियों और कुछ विदेशी भाषाओं में भी समाचारपत्र पंजीकृत किए जा रहे हैं.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार तब सबसे अधिक समाचारपत्र हिंदी में (3,265) प्रकाशित किए जा रहे थे. इसके बाद स्थान था अंग्रेजी (873), बांग्ला (492), गुजराती (477), उर्दू (403) और मराठी (329). प्रसार में भी हिन्दी के समाचारपत्र (6,70,35,756) प्रतियों के साथ सबसे आगे थे. उसके बाद 2,72,90,601 प्रतियों के साथ अंग्रेजी का स्थान था. 83,52,093 प्रतियों के साथ गुजराती प्रेस का स्थान तीसरा था. 81,09,935 प्रतियों के साथ उर्दू और 76,91,166 प्रतियों के साथ मलयालम का स्थान इसके फौरन बाद था. जिन भाषाओं में 100 से अधिक समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे थे उनके नाम हैं मराठी (127), उर्दू (162) और तेलुगू (110).
इधर 2001 के जनगणना रिपोर्ट से भारत में बोली जाने वाली भाषाओं के बारे में चौंकाने वाली जानकारी मिली है. वो ये कि भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की तादाद इस कदर बढ़ी है कि वह ब्रिटेन की कुल आबादी से दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है. यही नहीं भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या ने ब्रिटेन को छोड़ समूचे यूरोप को पीछे छोड़ दिया है.
आर्थिक उदारीकरण और सूचना क्रांति की जय हो! बाजार की दृष्टि से यह स्थिति सुखद हो सकती है, पर एक राष्ट्र के आत्मसम्मान की दृष्टि से नहीं. सीमा सुरक्षा बल में आईजी के पद से अवकाश ग्रहण कर चुके और पचास से ज्यादा पुस्तकों के लेखक वीरेन्द्र कुमार गौड़ कहते हैं कि देश के लोगों को भ्रम में नहीं रहना चाहिए. दरअसल हमारी राष्ट्रभाषा अंग्रेजी ही है. दर्जा भले ही राजभाषा का हो पर उसका पूरा उपयोग, मान-सम्मान राष्ट्रभाषा के जैसा ही है. सरकार में हिंदी दोयम दर्जे की ही है. कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति भी नहीं दिखाई देती. जब मुलायम सिंह रक्षामंत्री बने थे तो उन्होंने रक्षा मंत्रालय में हिंदी में काम करने पर जोर जरूर दिया था. पर वो भी नहीं हो सका. प्रसिद्ध भाषाविद सुरेश कुमार के अनुसार अंग्रेजी तो स्वदेशीकृत भाषा के रूप में देश में स्वीकृत हो ही चुकी है. क्योंकि इसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार की ताकत है. बाजार की ताकत हिंदी में भी कम नहीं है. पर अंतरराष्ट्रीय ताकतें, बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी को क्यों बढ़ाना चाहेंगी. हिंदी को घर-घर में लोकप्रिय बनाने वाले बॉलीवुड में फिल्मों की पटकथा रोमन में लिखी जा रही है. इसमें कोई शक नहीं कि अंतरजाल यानी इंटरनेट पर हिंदी का भी प्रसार तो खूब हो रहा है. पर अंग्रेजी का स्थान व्यापक है.
दरअसल हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा न देने के पीछे राजनेताओं के मन में व्यापत वह भय भी है, जो हिंदी को लेकर हिंदीतर राज्यों में उठता रहता है. पहले तो दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध दिखाई देता था. पर इन दिनों वह नहीं के बराबर रह गया है. इसके विपरीत देश के कई हिस्सों में स्थानीय भाषा के प्रति भावनात्मक उबाल देखा जा सकता है. महाराष्ट्र में तो यह शिवसेना और मनसे जैसे स्थानीय राजनीतिक दलों का प्रिय विषय है ही. अब पंजाब में भी सारे बोर्ड, नामपट्ट की तख्तियां पंजाबी भाषा में करने की मुहिम शुरू हो गई है. और यही वजह भी है कि केंद्रीय सरकार हिंदी के नाम पर फूंक-फूंक कर कदम रखती है. केन्द्र सरकार की यह सुविचारित नीति रही है कि प्रेरणा, प्रोत्साहन व सदभावना द्वारा राजभाषा हिंदी का प्रयोग इसके कार्यालयों में करवाया जाए. पर जिस रफ्तार से यह चल रहा है, और इसी बीच अंग्रेजी जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उससे तो हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने का सपना शायद ही कभी साकार हो. और जब हिंदी का यह हाल है तो भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मैथिली, मगही, अंगिका,वज्जिका आदि की कौन पूछे. हालांकि हिंदीभाषी राज्यों में भोजपुरी आदि ये जो भाषाएं हिंदी का ही अंग बताकर दबा दी गई थीं, अब वे भी स्वाभिमान से सिर उठाने और रोजगार की भाषा बनने के लिए अकुला रही हैं. सरकार तो उनकी भी उपेक्षा ही कर रही है.
सिवाय उर्दू के पोषण के केन्द्र की कोई भी सरकार किसी अन्य भाषा के प्रति पूर्णतया संवेदनशील नहीं रही है. 1972 में गठित गुजराल कमेटी की रिपोर्ट से लेकर, सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्टों को देखें तो सरकार की धार्मिक अल्पसंख्यकों के सर्वांगीण विकास के प्रति वाजिब चिंता का एहसास होता है. उर्दू का पूरा विकास होना ही चाहिए. पर अन्य भाषाओं का भी क्यों नहीं. सरकार ने इस देश में अल्पसंख्यक भाषा भी महज उर्दू को ही मान लिया लगता है. कम से कम रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट से तो यही लगता है. भोजपुरी, अवधी, ब्रज आदि उत्तर भारत की क्षेत्रीय भाषाओं की कौन पूछे जब सरकार हिंदी के प्रति ही ईमानदार और पूरी तरह संवेदनशील नहीं दिखती हो.एक समय था जब देश के हिंदीभाषी जिसको न निज भाषा तथा निज देश पर अभिमान है, वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है जैसी पंक्तियों से प्रेरणा ग्रहण करते थे. आज इसकी चर्चा तक नहीं होती. क्या हम अपने स्वाभिमान की कीमत पर हिंदी को इसी तरह धीर-धीरे पिछड़ते और अंग्रेजी की दासता कबूल करते खामोश देखते रहेंगे.
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अंग्रेजी को शिक्षा की भाषा बनाने का विरोध किया था. अंग्रेजों द्वारा हिंदी को आधुनिक शिक्षा के अयोग्य कहने के प्रश्न पर भी उन्होंने अनेक तर्कों से यह सिद्ध किया कि हिंदी में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा न केवल संभव है अपितु बेहतर तरीके से हो सकती है.
यह गंभीर संक्रमण काल है. पर इसकी वजह वैश्वीकरण बता कर खामोश रह जाना क्या उचित है. यह सच है कि अगर देश को आगे बढऩा है, लोगों को रोजगार हासिल करना है तो अंग्रेजी जरूरी है. पर रोजगार की भाषा के तौर पर हम हिंदी को खड़ा करने का शिद्दत से प्रयास क्यों नहीं करते.
कुछ समय पहले मैं रूस गया था. मास्को में एक भी साइन बोर्ड अंग्रेजी में नहीं दिखा. वह बिखरने के बाद भी भाषा के सवाल पर कोई समझौता नहीं करना चाहता.
देश में हिंदी शिक्षा की उपेक्षा ऐसे भी दिखती है, बड़े शहरों में चल रहे नामचीन विद्यालय बच्चों को प्रवेश देते समय उनके माता पिता का साक्षात्कार लेते हैं, और यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें अंग्रेजी आती है. टाटा स्काई तो इसी मानसिकता को बाकायदा विज्ञापन चला कर भुनाने की कोशिश कर रहा है.
देश के कई स्कूलों ने तो अपने परिसर में हिन्दी बोलने पर प्रतिबंध लगा रखा है. हिन्दी बोलने पर विद्यार्थियों को जुर्माना भरना पड़ता है.
बहरहाल संसद के दरवाजे पर इस तरह असहाय खड़ी हिंदी की सुध लेने वाला कोई नहीं. हिंदी प्रदेश के सांसद भी नहीं. एक बानगी देखिए- सन 2000 से लेकर 3 मार्च 2010 तक लोकसभा और राज्यसभा दोनों मिलाकर हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में कुल मिलाकर महज 102 सवाल पूछे गए. और सारे सवालों के जवाब केन्द्र में सत्तारूढ़ रही सरकारों की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.
हालांकि तारीफ करनी पड़ेगी यूपीए सरकार की. पहले यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने हिंदी में बोलना शुरु किया था. और अब हाल में केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने भी बिहार में हिंदी बोलकर सबका ध्यान आकर्षित किया. पर इससे हिंदी का तो कोई भला नहीं हो रहा. राज्यसभा में दिनांक 3 सितंबर 2007 को नंदी येल्लैया ने अतारांकित प्रश्न संख्या 2378 में पूछा था कि क्या सरकार के सभी स्वायत्त तथा अधीनस्थ कार्यालयों द्वारा सरकार की राजभाषा नीति का पालन तथा क्रियान्वयन किया जाना अनिवार्य है? इसका जवाब देते हुए राज्य मंत्री माणिकराव गावित ने कहा कि जी हां इसका पालन अनिवार्य है. सरकार कहती तो है कि वह हिंदी को बढ़ावा देने के लिए तमाम प्रयास कर रही है, योजनाएं चला रही है. मगर सच कुछ और है.
अभी तक निर्धारित सभी क्षेत्रों (अर्थात 'क' 'ख' एवं 'ग') में स्थित कार्यालयों के कमचारियों को हिंदी का प्रशिक्षण देने का काम तक पूरा नहीं हुआ. समय सीमा बढ़ाते-बढ़ाते वर्ष 2008 के अंत तक प्रशिक्षण का काम पूरा करना तय किया गया था. लेकिन अब सरकार ने इन सभी कर्मचारियों को हिंदी का प्रशिक्षण वर्ष 2015 के अंत तक पूरा कर लेने का नया लक्ष्य रखा है. देश के कई राज्यों में तो राजभाषा हिंदी भाषाई अल्पसंख्यकों की सूची में शामिल है. दरअसल हिंदी को लेकर सरकार में उपेक्षा का भाव आज कोई नया नहीं है. बल्कि यह हाल तो दशकों से है. लोकसभा में दिनांक 29 जुलाई 2003 को राजो सिंह ने अतारांकित प्रश्न संख्या 1207 में उपप्रधानमंत्री से प्रश्न किया था कि ऐसे कौन-कौन से मंत्रालय और विभाग हैं जिन्होंने गत तीन वर्षों के दौरान प्रत्येक तीन महीनों पर हिंदी सलाहकार समिति की बैठकें बुलाई हैं. तो जवाब में गृह राज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद ने कहा था कि वर्ष 2000, 2001 और 2003 में प्रति तिमाही एक बैठक नियमित रूप से आयोजित करने वाला कोई मंत्रालय और विभाग नहीं था. आज कितने मंत्रालय या विभाग इस पर अमल कर रहे हैं, यह पूछने की जहमत भी कोई नहीं उठाता. और यही वजह है कि अंग्रेजी सरकार की दुलारी बनी राज कर रही है.
हालांकि हिंदी के प्रचार प्रसार के नाम पर सरकार ढेरों योजनाएं चलाने का दावा करती है, पर हकीकत को बयान करता यह उदाहरण देखें. लोकसभा में दिनांक 23 अप्रैल 2002 में प्रो. दुखा भगत ने प्रश्न संख्या 4668 में गृह मंत्री से पूछा था कि उनके मंत्रालय के अधीन विभिन्न मंत्रालयों में लगाए गए कंप्यूटरों द्वारा लगभग कितने प्रतिशत पत्रों का उत्तर हिंदी में दिया जाता है? तो तत्कालीन गृहराज्य मंत्री आई डी स्वामी ने कहा कि इस तरह के आंकड़े एकत्र नहीं किए जाने के कारण यह सूचना नहीं दी जा सकती है.
कुल मिलाकर हिंदुस्तान को आजादी दिलाने वाली हिंदी आजाद हिंदुस्तान में छह दशकों बाद संख्या में आगे होकर भी अंग्रेजी का स्थान नहीं ले पायी है. कहां तो हम इसे संयुक्तराष्ट्र में खड़े देखना चाहते थे. पर अभी तो ये अपने देश में संसद की दहलीज पर अपने सम्मान और राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए न्याय की आस में खड़ी है.
Monday, January 19, 2015
Sonia Gandhi blackmailed Atal Bihari Vajpayee
The question she asked is the only way things change in india when the central govt change. ANd she felt that jay did mistake by bringing down vajpayee govt. First of all mr vajpayee protected the sonia gandhi fully. I will tell you three instance who he protected sonia gandhi family.
1. Rahul Gandhi arrested in Boston airport on Sept 26 2001 and he was caught with 1,60,000 USD in CASH and a bag of white powder which I have been told as heroine but I have not confirmation on that part. Mr Vajpayee asked his principle secretary Brajesh Mishra to call condoleezza rice and said Rahul gandhi should be released fr4om FBI. FBI has taken Rahul Gandhi into a Separate room for interrogation on Boston Airport. The crime which he committed was, in America you can enter with more than 10,000USD in cash without declaring it and the punishment is 8 years for every installment of 10K dollar you exceed So he had 16 times and therefore you will be sent to jail for 128 years 16 times of 8. The Bush Govt saying to call FBI off because this will affect our Indo-US relation and FBI agreed. After 9 hours of questioning the FBI told Rahul gandhi if you if give a undertaking that whenever we will call you again you will apear in USA then we will let you go. They took that in writing and they registered a case also. Now why Vajpayee wanted to protect Rahul Gandhi multiple times? (3.32min)
2 Mr Quattrocchi, the Malaysian govt that decided to extradite him to INdia and they informed indian govt. Quattrocchi old SOnia Gandhi that if I have to go to Indian Jail then I will speak out everything because I can not stand Indian Jail, I will buy out my way out. Then Sonia Gandhi went to Vajpayee. And Vajpayee ensured that the CBI lawyer in Malaysia was selected by the Quattrocchi. Vajpayee told that please we are not interested in his extradition. Because our smooth function of the govt will be disturbed. And Quattrocchi won that case easily and he went back to Italy. Of Course there was another episode in Argentina but that is thanks to Sonia Gandhi. (4.56min)
3. I went to Delhi High court and filed a petition in 2001 that Sonia Gandhi is receiving payments from Russian KGB and when Russian govt had when asked by a Hindu News paper that is it true then they said on record Yes, because Sonia Gandhi and Nehru family has always been friendly to Soviet Union. So with that proof I filed it. Because the Americans, after the Collapse of Soviet Union, they went into KGB library and they photocopied every document of KGB and placed in princeton library, harvard library and library of Congress. So I went to Harvard library and download it. And got all Indians who got KGB money and Sonia Gandhi was in that. Sonia Gandhi has also been smuggling idols from indian temple to abroad and getting it auctioned by her sisters. So for this purpose of creating a bill, she created two shops in Italy. One was near Milan and it was called Etnica and another in her hometown of uplasano near turin, it is called Ganapati I had people who go there and take photographs and give me copies of that. So I have filed that said she is smuggling our paintings and our Murits from our temples and having them auctioned. After keeping them for some time in her shop and making false bill and then taking them to London. I also made other charges about her educational qualification that she claimed that she is educated from cambridge university but she has not passed fifth class. ALl these charges as Prima facie accepted by the Delhi High court and they issued notice to CBI. Court said to CBI to get these documents, original documents because Swamy got photostats. So CBI went to Italy and Russia and both govt said that we are ready to give all the documents but you first give us a letter rogatory, which is a international procedure. Which mean a FIR has to be registered and this FIR has to be filed in court by court of Law in India. Then court will issue a request which is called letter rogatory to these governments saying please assist as in prosecution of the accused. So the matter came in court so I argued that let the govt register a FIR and go to court and get a letter rogatory. The counsel for Raju Ramachandran which was counsel for the CBI. He said this is sudden development and a I need instructions from the govt so please give me 2 weeks adjournment So two weeks adjournment was given. And after two weeks when the court assembled the counsel for the CBI was changed from Mr Raju Ramachandran to Mr Malhotra who is a congressman, who takes up Sonia Gandhi cases in election matters and all that. ANd I was surprised I asked Arun Jaitely, he was the Law Minister later on, how did you change and bring a congressman? He said Mr Atal Bihari Vajpayee instructed me to do that. So the court posted it, for hearing whether FIR should be directed by the court itself if the govt did not willing, which was my demand. But in the meantime Vajpayee advanced the election and he lost the election and SOnia gandhi came to power. After that you know that it is very difficult for judges to go against govt. Balakrishnan became the Chief justice who was Great chamcha of Sonia Gandhi. So I did not pursue the matter and left there. (10.54 min)
Now comes to your question why. Ever since Indira Gandhi died Mr Vajpayee was blackmailed by the Nehru family. Why he was blackmailed and for what he was blackmailed is too long story for me to go. Someday you call me for a special lecture on Vajpayee i will tell. Because you will ask me how you know this, how you know that, what is the proof, so I must have all those things ready etc.
But broadly speaking Mr Vajpayee had much to hide. During the emergency he wrote apology letter to Indira Gandhi saying that what Jayaprakash narayan done was wrong and he is sorry for it. And so please let me out of Jail. Indira Gandhi let him out of Jail. So all this put together his govt was hand in glove with SOnia Gandhi. So therefore Jayalalithaa told me that we should bring this govt down and thats how his govt brought down. That time I did not know that Sonia Gandhi and Vajpayee also had deal. I thought Indira Gandhi and Vajpayee had deal. So Rajiv Gandhi was my friend so he never thought of Vajpayee very high. Therefore I assumed his wife will be also like that, later on I came to know that these two (Sonia & Vajpayee) also had deal. So to bring down this govt Sonia Gandhi agreed to help us, because she wanted to put pressure on vajpayee for the Quattrochi matter to block the case and once she got deal she left us halfway. So even if Jayalalithaa has not decide to bring down the govt Vajpayee govt continued and all these 5 years he protected the Sonia gandhi and thats why I supported Jayalalitha.
अब चरम पे खड़ा धर्म युद्ध
हो शंखनाद रण की पुकार ।
जब शोर करें ये दैत्य सारे
तब हृदय छले तेरी हुंकार ।
बलवान बनाता देश तुझे
पर धर्म बनाता तुझे अमर ।
कठिनाई बढ़ने वाली है
तू शांत चित्त हो कस कमर ।
इस बार युद्ध मायावी है
भरपूर हो रहा छल कपट ।
तू रहा सत्य की बाँह थाम
इस बल से शत्रु से निपट ।
शत्रु तेरे हैं तीन तरफ
हले कांग्रेसी प्रतिद्वंद ।
फिर सेना खड़ी विभीषण की
आखिर अमरीकी प्रतिबंध ।
यही क्रम है तेरे शत्रु का
इसी क्रम में इन पर वार कर ।
हों दृष्य या अदृष्य रहें
जनता संग इनका संहार कर ।
कुछ बातों का तुझे हो स्मरण
ये युद्ध नहीं तेरा निजी रण ।
ये युद्ध धर्म का, भारत का
सच पर अडिग यही तेरा प्रण ।
तूने अच्छा नेतृत्व दिया
बढ़ कर आगे मन जीत लिया ।
डूबे जाते थे जब ये दिल
नई किरण दिखा मनमीत दिया ।
जहाँ अंधकार गहरा फैला
कर दिया उजाला दीप जला ।
विचलित मूर्छित जो बैठे थे
हिंदुस्तानी उठ खड़ा चला ।
चला चला नहीं बैठेगा
मिला जोश नया उसे जीवन का ।
अब धूर्त मायावी पैठेगा
हमें होश मिला उसके मन का ।
होंगी भारत में कमीं कई
क्या कोस कोस कर बात बनी?
साकारात्मक जब सोचा तब,
मृद्ध शक्ति की साख जमी ।
ये सोच मिली है मोदी में
है जनता का यही प्रतिनिधी ।
बढ़ना है आगे भारत को तो
यही बची अब सफल विधी ।
मतदान पड़ेगा अभूतपूर्व
जनता में ऐसा रोष जगा ।
जब गिनती होगी वोटों की
रणबाँका बस मोदी होगा ।
तैयार रहो अब मोदी जी,
आता है शपथ ग्रहण का दिन ।
हो जीत तुम्हारी ऐसी कि
हमें याद रहे ये रण का दिन ।
Thinker's Pad: मैं, नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
Thinker's Pad: मैं, नरेन्द्र दामोदरदास मोदी: मैं, नरेन्द्र दामोदरदास मोदी करता हूँ ग्रहण शपथ ये करुं मातृ सेवा जीवनभर पल पल बीते इस पथ पे । अध्यात्म केंद्र जीवन का पर राष्ट्र क...
Thinker's Pad: मैं, नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
Thinker's Pad: मैं, नरेन्द्र दामोदरदास मोदी: मैं, नरेन्द्र दामोदरदास मोदी करता हूँ ग्रहण शपथ ये करुं मातृ सेवा जीवनभर पल पल बीते इस पथ पे । अध्यात्म केंद्र जीवन का पर राष्ट्र क...
Sunday, January 18, 2015
इन 4 टिप्स से बढ़ाई जा सकती है अपने एंड्रॉइड स्मार्टफोन की Security
एंड्रॉइड भारत ही नहीं, दुनिया का सबसे अधिक पॉपुलर मोबाइल प्लेटफॉर्म है, लेकिन इसकी सिक्युरिटी को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं। आइए, जानें कुछ ऐसी टिप्स जिनसे आप अपने स्मार्टफोन को और भी ज्यादा स्मार्ट बना सकते हैं।
डिवाइस मैनेजर एक्टिवेट करे
अपने एंड्रॉइड स्मार्टफोन में गूगल एंड्रॉइड डिवाइस मैनेजर एक्टिवेट कर लें। इससे यदि आपका फोन कहीं गुम हो जाता है, तो आप इस फीचर की मदद से अपना फोन ट्रैक कर सकते हैं। यह फीचर गूगल मैप और जीपीएस की मदद से काम करता है। इसकी मदद से आप अपने फोन को पांच मिनट के लिए फुल वॉल्यूम पर रिंग भी कर सकते हैं और अपना पूरा डाटा डिलीट भी कर सकते हैं। इसे आप सिक्युरिटी सेटिंग में डिवाइस एडमिनिस्ट्रेटर्स सेटिंग में जाकर चालू कर सकते हैं।
डिवाइस को इनक्रिप्ट करे
एंड्रॉइड फोन की यह खासियत होती है कि आप अपने स्मार्टफोन के पूरे डाटा को इनक्रिप्ट कर सकते हैं। इसके बाद आप जब भी अपना फोन दोबारा स्टार्ट करेंगे तो हर बार आपको एक पिन या पासवर्ड डालना होगा, ताकि आपका डाटा डीक्रिप्ट हो सके। ऐसा करने पर यदि आपका फोन किसी गलत व्यक्ति के पास जाता है तो वह बिना पासवर्ड डाले आपके डाटा तक नहीं पहुंच सकता है। आप अपनी एंड्रॉइड डिवाइस की सिक्युरिटी सेटिंग में जाकर अपने डाटा को इनक्रिप्ट कर सकते हैं।
एसडी कार्ड में न स्टोर करें
आपका फोन कई बार अजनबियों के हाथ में भी जाता है। इसलिए जरूरी है कि आप अपनी सभी सेंसेटिव इन्फॉर्मेशन और डाटा एसडी कार्ड में स्टोर न करें। दरअसल, फोन में से एसडी कार्ड निकालना बेहद आसान होता है और इस कुछ ही सेकंड में चुराया जा सकता है। इसलिए क्रेडिट कार्ड नंबर, पासवर्ड और सभी जरूरी दस्तावेजों की कॉपी यदि फोन में स्टोर करना है तो उसे इंटरनल स्टोरेज में ही स्टोर करें। इससे आपका डाटा एसडी कार्ड से कहीं अधिक सुरक्षित रहेगा।फोन को रूट न करें
अपने स्मार्टफोन को कभी रूट न करें। रूटिंग का मतलब अपने ऑपरेटिंग सिस्टम से छेड़छाड़ करना होता है। कई बार यूजर्स नए फीचर्स जोड़ने के लिए कंपनियों द्वारा दी गई डिफॉल्ट सेटिंग्स को बदलते हैं। इससे सिक्युरिटी को बड़ा खतरा होता है। इसके बदले मोबाइल सुरक्षित रखने के लिए स्क्रीन लॉक
और गैलरी व मैसेजिंग जैसे ऐप में स्टोर प्राइवेट डाटा को सुरक्षित करने के लिए अलग से लॉकिंग ऐप डाउनलोड करना बेहतर होगा। इससे आपकी डिवाइस में सिक्युरिटी लेवल और स्ट्रॉन्ग हो जाएगा।
Saturday, January 17, 2015
अब 'भेजा-टू-भेजा' भेज सकेंगे ईमेल!
क्या हम किसी दिन अपने दिमाग़ों को इंटरनेट से जोड़ सकते हैं.
इंटरनेट कनेक्शन आज सबसे तेज़ और किसी भी अन्य संचार प्रणाली से बढ़कर हो गया है जो हमें जुड़े रखने में मदद करता है.
कभी-कभी हमें महसूस होता है कि हम अपनी इच्छा से ईमेल संचार करने की कगार पर हैं.
मैंने ईमेल भेजा, आपको मिला, आपने इसे पढ़ा और जवाब दिया- सब कुछ बस कुछ ही सेकंड में हो गया.
भले ही आप ये मानें या न मानें कि त्वरित संचार अच्छी बात है, लेकिन यह निश्चित तौर पर हो रहा है.
दिमाग़ से दिमाग़ के तार
बहुत समय नहीं बीता जब पह पत्र के लिए कई दिनों या हफ्तों तक इंतज़ार करते थे- लेकिन आज एक जवाब के लिए कुछ घंटों का इंतज़ार ही अनंत काल जैसा लगने लगता है.
शायद ऑनलाइन संचार में तेज़ी लाने का वेब पर अंतिम रास्ता सीधे दिमाग़ से दिमाग़ के बीच संचार होगा.
अगर दिमाग़ को ही इंटरनेट से जोड़ दिया जाए तो तंग करने वाली टाइपिंग की ज़रूरत ही नहीं रहेगी.
बस हमारा दिमाग़ कोई आइडिया सोचेगा और इसे तुरंत अपने दोस्त को भेज देगा. फिर चाहे वह एक ही कमरे में हो या फिर लाख़ों किलोमीटर दूर.
फ़ाइल फोटो
बेशक, अभी हम वहाँ नहीं पहुँचे हैं, लेकिन हाल के एक अध्ययन ने इस दिशा में एक क़दम बढ़ाया है. इसमें उन लोगों के बीच इंटरनेट के ज़रिए दिमाग़ से दिमाग़ के बीच संचार का दावा किया गया है जो हज़ारों मील दूर हैं.
फ़ासला हज़ारों मील का
बार्सिलोना स्थित स्टारलैब के इस प्रोजेक्ट से जुड़े शोधकर्ता गिगलियो रुफ़िनी बताते हैं.
फ़ाइल फोटो
भारत में केरल के एक व्यक्ति के सिर में ब्रेन कंप्यूटर इंटरफ़ेस लगाया गया, जिसने दिमाग़ी तरंगे रिकॉर्ड की.
इसके बाद उस व्यक्ति को हाथों और पैरों के बारे में सोचने के निर्देश देते हुए अपने हाथों या पैरों में हलचल करने को कहा गया.
सोचने वाले व्यक्ति ने अपने पैरों को हिलाया, तो कंप्यूटर ने 0 रिकॉर्ड किया, लेकिन यदि उसने अपने हाथों को हिलाया तो कंप्यूटर ने 1 रिकॉर्ड किया.
इसके बाद 0 और 1 की यह सिरीज़ इंटरनेट के ज़रिए फ्रांस के स्ट्रासबर्ग स्थित व्यक्ति को भेजी गई. फ्रांस वाले व्यक्ति को टीएमएस रोबोट फिट किया गया था.
जटिल प्रक्रिया
फ़ाइल फोटो
जब संदेश भेजने वाले व्यक्ति ने अपने हाथों को हिलाने के बारे में सोचा, टीएमएस रोबोट ने संदेश पाने वाले व्यक्ति के दिमाग़ में इस तरह से पकड़ा कि आंख बंद होने के बावजूद उसे रोशनी दिखाई दी.
पैरों के बारे में सोचने पर संदेश पाने वाले व्यक्ति को किसी तरह की रोशनी नहीं दिखाई दी.
ये कुछ आसान लग सकता है, लेकिन हर स्तर पर काफी जटिलताएं हैं. संदेश भेजने वाले को अपने हाथों और पैरों के बारे में सोचने पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करना होता है.
दिमाग़ में किसी और तरह की गतिविधि से संदेशों में घालमेल का ख़तरा बना रहता है. वास्तव में संदेश भेजने वाले को इस प्रक्रिया के लिए प्रशिक्षित किया जाता है.
कामयाबी पहली बार
फ़ाइल फोटो
इसके अलावा, ये प्रक्रिया भी बहुत धीमी है. रुफ़िनी कहते हैं, "इन प्रयोगों को दो तरह से देखा जा सकता है. पहला कि यह तकनीकी मामला है, और दूसरे कि ऐसी कामयाबी पहली बार मिली है."
लेकिन रुफ़िनी के सपने बड़े हैं. वे अहसास, भावनाओं और विचारों का सीधे दिमाग़ों के बीच संचार करना चाहते हैं.
रुफ़िनी कहते हैं, ‘‘अभी तकनीकी बेहद सीमित है, लेकिन बहुत जल्द बहुत ताक़तवर हो सकती है. ’’
फ़ाइल फोटो
बेशक, इस तरह के प्रयोग सफल होने पर कई ख़तरे भी हैं. इंटरनेट पर भेजी जानी वाली हर चीज़ को हैक या ट्रैक किया जा सकता है.
दिमाग़ से दिमाग़ के बीच संदेशों के आदान-प्रदान की तकनीकी का ग़लत इस्तेमाल भी किया जा सकता है.
फिर भी, कम से कम अभी तो ये पहेली ही है. हो सकता है कि कई दशकों के बाद किसी दिन आप ईमेल, संदेश और यहां तक कि कोई लेख सीधे अपने दिमाग़ में पा रहे होंगे.
Tuesday, January 13, 2015
www.arvindshashwat.com: लाल बहादुर शास्त्री जी की स्मृति पर विशेष
www.arvindshashwat.com: लाल बहादुर शास्त्री जी की स्मृति पर विशेष: 21 एक साधारण परिवार में जन्मे और विपदाओं से जूझते हुए सत्य, स्नेह, ईमानदारी कर्तव्यनिष्ठा एवं निर्भीकता के दम पर विश्व के सबसे बड़े प्रजा...
Monday, January 12, 2015
लाल बहादुर शास्त्री जी की स्मृति पर विशेष
21 एक साधारण परिवार में जन्मे और विपदाओं से जूझते हुए सत्य, स्नेह, ईमानदारी कर्तव्यनिष्ठा एवं निर्भीकता के दम पर विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने की अपने आपमें एक अनोखी मिसाल हैं- लालबहादुर शास्त्री।
अपने अदम्य साहस से सन् 1965 के युद्ध में पाकिस्तान के छक्के छुड़ा देने वाले दबंग शास्त्रीजी आज भी भारतीय एवं विश्व जनमानस के प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने यह ऐलान किया था-भारत को कोई कमजोर समझने की भूल न करे।
हम चाहे रहें या न रहें, हमारा देश और तिंरगा झंडा रहना चाहिए। और मुझे पूरा विश्वास है कि हमारा तिंरगा रहेगा। भारत विश्व के देशों में सर्वोच्च होगा। यह उन सबमें अपनी गौरवाशाली विरासत का संदेश पहुंचाएगा। ये शब्द भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री के हैं, जो उन्होंने लालकिले की प्राचीर से 15 अगस्त, 1965 को कहे थे। छोटी कद काठी में विशाल हृदय रखने वाले श्री शास्त्री के पास जहां अनसुलझी समस्याओं को आसानी से सुलझाने की विलक्षण क्षमता थी, वहीं अपनी खामियों को स्वीकारने का अदम्य साहस भी उनमें विद्यमान था। हृदय में छिपी देशप्रेम की चिंगारी से शास्त्रीजी को स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ जूझ मरने की शक्ति प्राप्त हुई। सन् 1965 में जब पड़ोसी देश पाकिस्तान ने हमारी सीमाओं का अतिक्रमण करने की भूल की तो उनका सरल स्वभाव उग्र होकर दहक उठा। उनकी ललकार का मनोबल पाकर भारतीय सैनिकों ने पाक-सेना को अपने इरादे बदलने के लिए विवश कर दिया।
शास्त्रीजी के नारे जय जवान, जय किसान ने किसानों और सैनिकों के माध्यम से देश में चमत्कार भरा उत्साह फूंक दिया। शास्त्रीजी प्रतिनिधि थे एक ऐसे आम आदमी के, जो अपनी हिम्मत से विपरीत परिस्थितियों की दिशाएं मोड़ देता है।
आज देश को ऐसे ही सशक्त नेतृत्व की जरूरत है।
21 शास्त्रीजी उस समय रेल मंत्री थे। सन् 1956 में अशियालूर में रेल दुर्घटना हुई। सारा देश स्तब्ध रह गया। इस दुर्घटना की जिम्मेदारी स्वयं लेते हुए शास्त्रीजी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। काश ! हम आज उनसे कुछ सीख पाते।
नेहरूजी के स्वर्गवास के बाद ऐसा लगा था, मानो वक्त थम गया है। ऐसे में उभरकर आए थे छोटी कद काठी में पर्वत के समान दृढ़ निश्चयी लालबहादुर शास्त्री। उनका हृदय भारत से दोस्ती रखने वालों के लिए लाल गुलाब की तरह कोमल और सुगंध से भरा था, लेकिन दुश्मनों के लिए था-अत्यंत कठोर और आक्रोश युक्त।
शास्त्रीजी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। अनाज के संकट से निपटने के लिए उन्होंने सप्ताह में एक दिन का या कम से कम एक समय का उपवास रखने की अपील की थी। ऐसा उन्होंने स्वयं भी किया।
उनका कहना था कि भारत का गौरव बनाए रखने तथा अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए देशवासी किसी के आगे हाथ न फैलाएं।
सन् 1965 में जब पाकिस्तान ने भारत की सरहदों में घुसपैठ करने की कोशिश की तो उसका करारा जवाब दिया था भारतीय सैनिकों ने। उन सैनिकों की कुर्बानियों के पीछे जोशीले शब्द थे-भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री के। शास्त्रीजी ने तब नारा दिया था-जय जवान, जय किसान और यह ऐलान किया था कि भारत को कोई कमजोर समझने की भूल न करे।
Wednesday, January 7, 2015
ज्ञान बांटने की होड़ लगी है...
अभी मैं अखबार पढ़ रहा था.. रेडियो सिटी चल रहा था।
तभी रेडियो सिटी की आर जे बोलीं कि जिसे देखो आज ब्लड-प्रेशर हो रहा है, जिसे देखो कहता है..मैं चल नहीं सकता... ऐसे में आप को करना क्या है, आप को अपनी दवाई रात में सोने से पहले खानी होगी... इससे इस बीमारी के ऊपर कंट्रोल ज़्यादा बढ़िया होता है और हार्ट-अटैक आदि का खतरा कम हो जाता है।
रेडियो जॉकी तर्क यह दे रही थीं कि रात में में कोई काम तो करना नहीं होता, बस आराम ही करना होता है, इसलिए एक बार अगर रात में दवाई ले ली तो उच्च रक्त चाप का बेहतर कंट्रोल हो पाएगा।
यह तर्क बिल्कुल बेबुनियाद सा लगा... वैज्ञानिक तथ्यों से रहित..... मुझे थोड़ा रक्तचाप रहने लगा था.. तब...उन्हीं दिनों मैंने प्राणायाम् और मेडीटेशन (ध्यान) सीखा....मेरी कोशिश रहती थी कि प्राणायाम् के तुरंत बाद तो कभी कभी रक्त चाप की जांच करवा ही लूं।
उसी दौरान दो चार बार तो मुझे अपनी मिसिज़ के अस्पताल भी बाद दोपहर जाने का अवसर मिला.....कईं बार जब लंच-ब्रेक होता.. तो मैं पहले वहां पर १५-२० मिनट के लिए मेडीटेशन करता और फिर ब्लड-प्रेशर को नपवा लेता....सामान्य आने पर राहत महसूस होती।
फिर मुझे समझ आने लगी कि यह बात अजीब सी है...बी.पी का स्तर तो सारे दिन ही सामान्य रहना चाहिए...ठीक है सुबह और शाम की रीडिंग में थोड़ा अंतर हो सकता है, लेकिन इस तरह से प्राणायाम् अथवा ध्यान के तुरंत बाद बी पी जांच करवा के आश्वस्त हो लेना पूरी तरह से ठीक नहीं है।
फिर जब धीरे धीरे यह बी पी का लफड़ा समझ में आने लगा तो अपना ज्ञान इस तरह से झाड़ दिया...
हाई-ब्लडप्रेशर का हौआ.. भाग १
दोस्तो, माफ़ करना....सच में मुझे पता नहीं कि कुछ साल पहले क्या लिखा था इन पोस्टों में.....लेकिन इतना इत्मीनान है सच के अलावा कुछ न लिखा होगा। हलवाई को अपनी मिठाई का पता रहता है, इसलिए वह नहीं खाता उसे.....बरसों बाद मेरा भी अपने लेखों के साथ व्यवहार कुछ कुछ इसी तरह का ही होता है।
हां, तो उस रेडियोसिटी की आर जे की बातों पर वापिस लौटते हैं...उसने भी आज यही कहा कि आप ज़िंदगी का आखिर उखाड़ क्या लेंगे, क्या कोई अभी तक कुछ उखाड़ पाया है!
हाई-ब्लडप्रेशर का हौआ.. भाग२
व्हाट्सएप पर एक जोक आया था.....कि सतसंग में तो इस मौसम वही जाने की इच्छा होती है जहां ब्रेड-पकोड़े का प्रसाद मिले....वरना ज्ञान तो फ्री में व्हाट्सएप में कुछ बंट रहा है। यहीं नहीं, सारे सोशल मीडिया पर और मॉस-मीडिया (जन संचार) पर भी जैसे होड़ सी लगी हुई है..
इन माध्यमों की पहुंच बहुत ज्यादा है.... लेिकन इस तरह के ज्ञान का इस्तेमाल ज़रा सोच समझ कर के ही करिएगा.....जैसे अगर कोई विशेषज्ञ आप को दवाई लेने के समय के बारे में इस तरह की बात कहे तो उस की बात बिना किसी किंतु-परंतु के मान लीजिए... वरना इस तरह की हल्की-फुल्की बातें को गंभीरता से लेते हुए कहीं मान ने लें!
जहां तक दवाईयों लेने के समय की बात है...यह केवल और केवल आप का डाक्टर जानता है... खाली पेट, खाने के तुरंत बाद, खाने के दो घंटे बाद, रात को सोने से पहल, दिन में कितनी बार लेनी है ... पानी के साथ, दूध के साथ... बहुत तरह की बातें होती हैं, इस के पीछे वैज्ञानिक कारण होते हैं...इन्हें नज़र-अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। एक बात पल्ले बांध लें कि हर दवाई का अलग मिजाज है....हां, बिल्कुल लोगों की तरह.......और इस मिजाज को रेडियो जाकी नहीं, अनुभवी चिकित्सक ही जानते हैं।
लेकिन एक बात ज़रूर है....ये रेडियो जॉकी आप को खुश रखने की कला में निपुण होते हैं......यार, ऐसे में वे भी तो हम सब के हाई ब्लड-प्रेशर को कंट्रोल करने में मदद तो कर ही रहे हैं जिस के लिए ये सब साधुवाद के पात्र हैं। सुबह सुबह अपनी चटपटी बातों से लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरने आ जाते हैं.
बस, यही बात करने की आज सुबह सुबह इच्छा हो गई...वैसे आज कल ब्लड-प्रेशर की जांच करने के लिए नये नये डिवाईस आ रहे हैं...कभी फिर इन के बारे में चर्चा करेंगे......बस, आप ज़रूरत से ज़्यादा न सोचा करें..यह एकदम सुपरहिट फार्मूला है।
आज सुबह यह गाना सुन लें?...बर्फी फिल्म का बहुत सुंदर गीत है... इत्ती सी हंसी, इत्ती सी खुशी....प्रियंका चोपड़ा और रणबीर कपूर को इन की बेहतरीन एक्टिंग के लिए १०० में से १०० अंक......याद है फिल्म देखते कितनी बार आंखें नम हो गई थीं (सच कहूं तो बस नम ही नहीं...) ...इतने संवेदनशील विषय को इतनी परपेक्शन के साथ परदे पर उतारने के लिए....
Friday, January 2, 2015
मौत का सर्वोत्तम ढंग-- कैंसर?
मुझे भी आप की ही तरह यह हैडिंग बहुत ही अटपटा लगा था ... लेकिन जब मैंने कल टाइम्स ऑफ इंडिया में एक छोटी सी रिपोर्ट को देखा तो पता चला कि एक विश्व विख्यात मेडीकल जर्नल का संपादक कहना क्या चाह रहा है।
विश्व के सर्वश्रेष्ठ मैडीकल जर्नल के भूतपूर्व संपादक रिचर्ड स्मिथ ने यह कह कर मैडीकल जगत में तहलका मचा दिया है कि मरने का सब से बढ़िया तरीका कैंसर रोग है।
रिचर्ड स्मिथ का कहना है कि कैंसर के मरीज़ों को अत्यंत-महत्वाकांक्षी कैंसर रोग विशेषज्ञों के महंगे इलाज से दूर रहना चाहिए.. अरबों रूपये कैंसर के इलाज पर बहाने से बचना चाहिए .. फिर भी कैंसर से मौत तो भयानक रूप से हो ही जाती है।
संपादक रिचर्ड स्मिथ का कहना है कि कैंसर से होने वाली मौत बेस्ट है। मरने वाला अलविदा कह सकता है, अपनी ज़िंदगी के बीते लम्हों को याद कर सकता है, आखिरी संदेश छोड़ सकता है, शायद विशेष जगहों पर आखिर बार जा भी सकता है, मनपसंदीदा संगीत का लुत्फ़ उठा सकता है, पसंद की कविताएं पढ़ सकता है, और अपनी आस्था के अनुसार अपने ईश्वर, अल्ला, गॉड से मिलने की तैयारी भी कर सकता है। वह आगे कहता है कि उस के विचार में यह प्यार, मोर्फीन और विस्की के संग संभव है, लेकिन वे फिर से सावधान करते हैं कि अति-महत्वाकांक्षी कैंसर रोग विशेषज्ञों से दूर रहना चाहिए। रिचर्ड ने यह भी लिखा है कि अधिकतर लोग अचानक मौत की इच्छा रखते हैं लेकिन इस तरह की मौत सगे-संबंधियों पर भारी सािबत होती है।
Subscribe to:
Comments (Atom)