Thursday, January 22, 2015
क्या अंग्रेजी बन गई है राष्ट्रभाषा ?
क्या अंग्रेजी बन गई है राष्ट्रभाषा?
आजादी के 63 बरस बीत जाने के बाद भी हिंदी इस देश में राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा सकी, अब भी यह सह राजभाषा के रूप में ही संघर्षरत है. जबकि हर ओर अंग्रेजी का बोलबाला है, सेना, सरकार, बाजार से लेकर शिक्षा और लोकाचार तक. तो क्या अघोषित तौर पर अंग्रेजी बन गई हमारी राष्ट्रभाषा-
खड़ी बोली खड़ी है. संसद के दरवाजे पर. ठिठकी, सहमी और सकुचायी सी. 63 साल हो गए. अंग्रेजी ने कुर्सी खाली नहीं की. सो खड़ी ही है. देश के सम्मानित नेताओं ने कहा था कि जबतक हिंदी कामकाज न संभाल ले, तबतक दोनों काम करें. हिंदी कामकाज संभाल ले तो उसे पूरी तरह कुर्सी दे दी जाएगी. इसकी समय सीमा भी तय हुई कि 1965 तक हिंदी राज का काज संभाल लेगी. और तब अंग्रेजी को मुख्य राजभाषा के पद से हटा कर हिंदी को मुख्य राजभाषा का दर्जा दे दिया जाएगा. ऐसा नहीं है कि इतने सालों में हिंदी कामकाज संभालने लायक नहीं हो पायी है. पर अंग्रेजी उसे काम करने कहां देती है. उसे एक कोने में समेट दिया गया है. सारा काम अंग्रेजी में. हिंदी में तो बस अनुवाद. बातें तो कुछ हिंदी में हो भी जाएं, काम अंग्रेजी में ही होता है. कुछ नाम मात्र के अपवाद को छोड़ दें तो संघ के समूचे कामकाज का यही हाल है.
रस्मी तौर पर हिंदी के नाम पर हो रहे कुछ कामों को छोड़ दें तो भारत सरकार का सारा कामकाज मुख्य राजभाषा के रूप में अंग्रेजी ही संभाल रही है. सनद रहे कि प्रथम-राजभाषा आयोग की सिफारिशों पर विचार करने और उस पर अपनी राय राष्ट्रपति को देने के लिए लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्यों की एक समिति संविधान के अनुच्छेद 344 के खंड (4) के उपबंधों के अनुसार गठित की गई थी. समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति के समक्ष 8 फरवरी, 1959 को पेश की. इसको स्वीकार करते हुए 27 अप्रैल, 1960 को जारी अपने आदेश में राष्ट्रपति ने कहा था- 'विभिन्न प्रादेशिक भाषाएं राज्यों में शिक्षा और सरकारी काम-काज के माध्यम के रूप में तेजी से अंग्रेजी का स्थान ले रही है. यह स्वाभाविक ही है कि प्रादेशिक भाषाएं अपना उचित स्थान प्राप्त करें.' राष्ट्रपति के आदेश में यह भी कहा गया था- 1965 तक अंग्रेजी मुख्य राजभाषा और हिन्दी सहायक राजभाषा रहनी चाहिए. 1965 के उपरान्त जब हिन्दी संघ की मुख्य राजभाषा हो जाएगी, तब अंग्रेजी सहायक राजभाषा के रूप में ही चलती रहनी चाहिए.
आदेश में साफ तौर पर यह भी कहा गया था कि संघ के प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी के प्रयोग पर कोई रोक इस समय नहीं लगाई जानी चाहिए और अनुच्छेद 343 के खंड (3) के अनुसार इस बात की व्यवस्था की जानी चाहिए कि 1965 के उपरान्त भी अंग्रेजी का प्रयोग इन प्रयोजनों के लिए, जिन्हें संसद् विधि द्वारा उल्लिखित करे तब तक होता रहे जब तक वैसा करना आवश्यक रहे.
इधर सरकार के एक बयान ने देश के हिंदी प्रेमियों को जोर का झटका धीरे से दिया. सवाल देश में हिंदी की संवैधानिक स्थिति और देश की राष्ट्रभाषा के बारे में था. यह सवाल संसद में सत्यव्रत चतुर्वेदी और मोती लाल बोरा ने उठाया था. बात 3 मार्च 2010 की है. इन दोनों नेताओं ने राज्यसभा में अपने अतारांकित प्रश्न संख्या 653 में पूछा कि क्या सरकार का ध्यान हाल ही में गुजरात उच्च न्यायालय के उस वक्तव्य की ओर गया है, जिसके अनुसार भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है और हिंदी अधिकारिक तौर पर राष्ट्रभाषा नहीं है और नहीं है, तो हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है? जवाब में गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने कहा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के संबंध में भारत के संविधान में कोई प्रावधान नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी संघ की राजभाषा है. पर आश्चर्य इस बात से हुआ कि इस पर किसी ने सरकार से यह नहीं पूछा कि इस देश को उसकी राष्ट्रभाषा कब मिलेगी. मिलेगी भी या नहीं. हिंदी की पक्षधर और उसी के सहारे व्यवसाय जमाने चमकाने वाली मीडिया भी इस बार मौन ही रही.
न सिर्फ हिंदी के अखबारों में अंग्रेजी शब्दों और रोमन लिपि का प्रयोग धड़ल्ले से होने लगा है, बल्कि हिंदी और अंग्रेजी के द्विभाषी अखबार भी प्रकाशित होने लगे हैं. ऐसे हिंदी अखबारों के संपादक इसके विनाशकारी खतरों की ओर ध्यान नहीं दे रहे. जब टेलीविजन पर अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा था तो तर्क दिया गया था कि उसकी पहुंच विदेशों में बैठे दर्शकों तक है, जो कठिन हिंदी समझ नहीं पाते. पर यूरोप जाएं, और वहां के टीवी चैनल को देखें. वे अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषा में सब टाइटल देने की जरूरत भी नहीं समझते.
भारतीय मीडिया का यह नया व्यवहार और अपनी ही भाषा हिंदी के प्रति यह भाव चिंतित करने वाला है. और वह भी तब है, जब देश भर में हिंदी अखबारों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है.
समाचार पत्र महापंजीयक की रिपोर्ट के अनुसार (अबतक यही आंकड़ा वेबसाइट पर उपलब्ध) 2004-2005 के दौरान देश में प्रकाशित दैनिकों की संख्या 1834 थी. जिनकी कुल प्रसार संख्या 7,86,89,266 प्रतियां थी. इनमें हिन्दी भाषा के दैनिको की संख्या 799 थी और उन्होंने 3,37,73,557 प्रतियों का और अंग्रेजी के 181 दैनिकों ने 1,07,71,169 प्रतियों के प्रसार का दावा किया था. इस तरह हिंदी पहले और अंग्रेजी दूसरे स्थान पर थी. भारत में संविधान की आठवीं अनुसूची में अंकित अंग्रेजी और 22 प्रमुख भाषाओं में समाचारपत्र पंजीकृत किए जाते हैं. साथ ही 100 अन्य भाषाओं, बोलियों और कुछ विदेशी भाषाओं में भी समाचारपत्र पंजीकृत किए जा रहे हैं.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार तब सबसे अधिक समाचारपत्र हिंदी में (3,265) प्रकाशित किए जा रहे थे. इसके बाद स्थान था अंग्रेजी (873), बांग्ला (492), गुजराती (477), उर्दू (403) और मराठी (329). प्रसार में भी हिन्दी के समाचारपत्र (6,70,35,756) प्रतियों के साथ सबसे आगे थे. उसके बाद 2,72,90,601 प्रतियों के साथ अंग्रेजी का स्थान था. 83,52,093 प्रतियों के साथ गुजराती प्रेस का स्थान तीसरा था. 81,09,935 प्रतियों के साथ उर्दू और 76,91,166 प्रतियों के साथ मलयालम का स्थान इसके फौरन बाद था. जिन भाषाओं में 100 से अधिक समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे थे उनके नाम हैं मराठी (127), उर्दू (162) और तेलुगू (110).
इधर 2001 के जनगणना रिपोर्ट से भारत में बोली जाने वाली भाषाओं के बारे में चौंकाने वाली जानकारी मिली है. वो ये कि भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की तादाद इस कदर बढ़ी है कि वह ब्रिटेन की कुल आबादी से दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है. यही नहीं भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या ने ब्रिटेन को छोड़ समूचे यूरोप को पीछे छोड़ दिया है.
आर्थिक उदारीकरण और सूचना क्रांति की जय हो! बाजार की दृष्टि से यह स्थिति सुखद हो सकती है, पर एक राष्ट्र के आत्मसम्मान की दृष्टि से नहीं. सीमा सुरक्षा बल में आईजी के पद से अवकाश ग्रहण कर चुके और पचास से ज्यादा पुस्तकों के लेखक वीरेन्द्र कुमार गौड़ कहते हैं कि देश के लोगों को भ्रम में नहीं रहना चाहिए. दरअसल हमारी राष्ट्रभाषा अंग्रेजी ही है. दर्जा भले ही राजभाषा का हो पर उसका पूरा उपयोग, मान-सम्मान राष्ट्रभाषा के जैसा ही है. सरकार में हिंदी दोयम दर्जे की ही है. कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति भी नहीं दिखाई देती. जब मुलायम सिंह रक्षामंत्री बने थे तो उन्होंने रक्षा मंत्रालय में हिंदी में काम करने पर जोर जरूर दिया था. पर वो भी नहीं हो सका. प्रसिद्ध भाषाविद सुरेश कुमार के अनुसार अंग्रेजी तो स्वदेशीकृत भाषा के रूप में देश में स्वीकृत हो ही चुकी है. क्योंकि इसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार की ताकत है. बाजार की ताकत हिंदी में भी कम नहीं है. पर अंतरराष्ट्रीय ताकतें, बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी को क्यों बढ़ाना चाहेंगी. हिंदी को घर-घर में लोकप्रिय बनाने वाले बॉलीवुड में फिल्मों की पटकथा रोमन में लिखी जा रही है. इसमें कोई शक नहीं कि अंतरजाल यानी इंटरनेट पर हिंदी का भी प्रसार तो खूब हो रहा है. पर अंग्रेजी का स्थान व्यापक है.
दरअसल हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा न देने के पीछे राजनेताओं के मन में व्यापत वह भय भी है, जो हिंदी को लेकर हिंदीतर राज्यों में उठता रहता है. पहले तो दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध दिखाई देता था. पर इन दिनों वह नहीं के बराबर रह गया है. इसके विपरीत देश के कई हिस्सों में स्थानीय भाषा के प्रति भावनात्मक उबाल देखा जा सकता है. महाराष्ट्र में तो यह शिवसेना और मनसे जैसे स्थानीय राजनीतिक दलों का प्रिय विषय है ही. अब पंजाब में भी सारे बोर्ड, नामपट्ट की तख्तियां पंजाबी भाषा में करने की मुहिम शुरू हो गई है. और यही वजह भी है कि केंद्रीय सरकार हिंदी के नाम पर फूंक-फूंक कर कदम रखती है. केन्द्र सरकार की यह सुविचारित नीति रही है कि प्रेरणा, प्रोत्साहन व सदभावना द्वारा राजभाषा हिंदी का प्रयोग इसके कार्यालयों में करवाया जाए. पर जिस रफ्तार से यह चल रहा है, और इसी बीच अंग्रेजी जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उससे तो हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने का सपना शायद ही कभी साकार हो. और जब हिंदी का यह हाल है तो भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मैथिली, मगही, अंगिका,वज्जिका आदि की कौन पूछे. हालांकि हिंदीभाषी राज्यों में भोजपुरी आदि ये जो भाषाएं हिंदी का ही अंग बताकर दबा दी गई थीं, अब वे भी स्वाभिमान से सिर उठाने और रोजगार की भाषा बनने के लिए अकुला रही हैं. सरकार तो उनकी भी उपेक्षा ही कर रही है.
सिवाय उर्दू के पोषण के केन्द्र की कोई भी सरकार किसी अन्य भाषा के प्रति पूर्णतया संवेदनशील नहीं रही है. 1972 में गठित गुजराल कमेटी की रिपोर्ट से लेकर, सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्टों को देखें तो सरकार की धार्मिक अल्पसंख्यकों के सर्वांगीण विकास के प्रति वाजिब चिंता का एहसास होता है. उर्दू का पूरा विकास होना ही चाहिए. पर अन्य भाषाओं का भी क्यों नहीं. सरकार ने इस देश में अल्पसंख्यक भाषा भी महज उर्दू को ही मान लिया लगता है. कम से कम रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट से तो यही लगता है. भोजपुरी, अवधी, ब्रज आदि उत्तर भारत की क्षेत्रीय भाषाओं की कौन पूछे जब सरकार हिंदी के प्रति ही ईमानदार और पूरी तरह संवेदनशील नहीं दिखती हो.एक समय था जब देश के हिंदीभाषी जिसको न निज भाषा तथा निज देश पर अभिमान है, वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है जैसी पंक्तियों से प्रेरणा ग्रहण करते थे. आज इसकी चर्चा तक नहीं होती. क्या हम अपने स्वाभिमान की कीमत पर हिंदी को इसी तरह धीर-धीरे पिछड़ते और अंग्रेजी की दासता कबूल करते खामोश देखते रहेंगे.
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अंग्रेजी को शिक्षा की भाषा बनाने का विरोध किया था. अंग्रेजों द्वारा हिंदी को आधुनिक शिक्षा के अयोग्य कहने के प्रश्न पर भी उन्होंने अनेक तर्कों से यह सिद्ध किया कि हिंदी में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा न केवल संभव है अपितु बेहतर तरीके से हो सकती है.
यह गंभीर संक्रमण काल है. पर इसकी वजह वैश्वीकरण बता कर खामोश रह जाना क्या उचित है. यह सच है कि अगर देश को आगे बढऩा है, लोगों को रोजगार हासिल करना है तो अंग्रेजी जरूरी है. पर रोजगार की भाषा के तौर पर हम हिंदी को खड़ा करने का शिद्दत से प्रयास क्यों नहीं करते.
कुछ समय पहले मैं रूस गया था. मास्को में एक भी साइन बोर्ड अंग्रेजी में नहीं दिखा. वह बिखरने के बाद भी भाषा के सवाल पर कोई समझौता नहीं करना चाहता.
देश में हिंदी शिक्षा की उपेक्षा ऐसे भी दिखती है, बड़े शहरों में चल रहे नामचीन विद्यालय बच्चों को प्रवेश देते समय उनके माता पिता का साक्षात्कार लेते हैं, और यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें अंग्रेजी आती है. टाटा स्काई तो इसी मानसिकता को बाकायदा विज्ञापन चला कर भुनाने की कोशिश कर रहा है.
देश के कई स्कूलों ने तो अपने परिसर में हिन्दी बोलने पर प्रतिबंध लगा रखा है. हिन्दी बोलने पर विद्यार्थियों को जुर्माना भरना पड़ता है.
बहरहाल संसद के दरवाजे पर इस तरह असहाय खड़ी हिंदी की सुध लेने वाला कोई नहीं. हिंदी प्रदेश के सांसद भी नहीं. एक बानगी देखिए- सन 2000 से लेकर 3 मार्च 2010 तक लोकसभा और राज्यसभा दोनों मिलाकर हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में कुल मिलाकर महज 102 सवाल पूछे गए. और सारे सवालों के जवाब केन्द्र में सत्तारूढ़ रही सरकारों की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.
हालांकि तारीफ करनी पड़ेगी यूपीए सरकार की. पहले यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने हिंदी में बोलना शुरु किया था. और अब हाल में केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने भी बिहार में हिंदी बोलकर सबका ध्यान आकर्षित किया. पर इससे हिंदी का तो कोई भला नहीं हो रहा. राज्यसभा में दिनांक 3 सितंबर 2007 को नंदी येल्लैया ने अतारांकित प्रश्न संख्या 2378 में पूछा था कि क्या सरकार के सभी स्वायत्त तथा अधीनस्थ कार्यालयों द्वारा सरकार की राजभाषा नीति का पालन तथा क्रियान्वयन किया जाना अनिवार्य है? इसका जवाब देते हुए राज्य मंत्री माणिकराव गावित ने कहा कि जी हां इसका पालन अनिवार्य है. सरकार कहती तो है कि वह हिंदी को बढ़ावा देने के लिए तमाम प्रयास कर रही है, योजनाएं चला रही है. मगर सच कुछ और है.
अभी तक निर्धारित सभी क्षेत्रों (अर्थात 'क' 'ख' एवं 'ग') में स्थित कार्यालयों के कमचारियों को हिंदी का प्रशिक्षण देने का काम तक पूरा नहीं हुआ. समय सीमा बढ़ाते-बढ़ाते वर्ष 2008 के अंत तक प्रशिक्षण का काम पूरा करना तय किया गया था. लेकिन अब सरकार ने इन सभी कर्मचारियों को हिंदी का प्रशिक्षण वर्ष 2015 के अंत तक पूरा कर लेने का नया लक्ष्य रखा है. देश के कई राज्यों में तो राजभाषा हिंदी भाषाई अल्पसंख्यकों की सूची में शामिल है. दरअसल हिंदी को लेकर सरकार में उपेक्षा का भाव आज कोई नया नहीं है. बल्कि यह हाल तो दशकों से है. लोकसभा में दिनांक 29 जुलाई 2003 को राजो सिंह ने अतारांकित प्रश्न संख्या 1207 में उपप्रधानमंत्री से प्रश्न किया था कि ऐसे कौन-कौन से मंत्रालय और विभाग हैं जिन्होंने गत तीन वर्षों के दौरान प्रत्येक तीन महीनों पर हिंदी सलाहकार समिति की बैठकें बुलाई हैं. तो जवाब में गृह राज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद ने कहा था कि वर्ष 2000, 2001 और 2003 में प्रति तिमाही एक बैठक नियमित रूप से आयोजित करने वाला कोई मंत्रालय और विभाग नहीं था. आज कितने मंत्रालय या विभाग इस पर अमल कर रहे हैं, यह पूछने की जहमत भी कोई नहीं उठाता. और यही वजह है कि अंग्रेजी सरकार की दुलारी बनी राज कर रही है.
हालांकि हिंदी के प्रचार प्रसार के नाम पर सरकार ढेरों योजनाएं चलाने का दावा करती है, पर हकीकत को बयान करता यह उदाहरण देखें. लोकसभा में दिनांक 23 अप्रैल 2002 में प्रो. दुखा भगत ने प्रश्न संख्या 4668 में गृह मंत्री से पूछा था कि उनके मंत्रालय के अधीन विभिन्न मंत्रालयों में लगाए गए कंप्यूटरों द्वारा लगभग कितने प्रतिशत पत्रों का उत्तर हिंदी में दिया जाता है? तो तत्कालीन गृहराज्य मंत्री आई डी स्वामी ने कहा कि इस तरह के आंकड़े एकत्र नहीं किए जाने के कारण यह सूचना नहीं दी जा सकती है.
कुल मिलाकर हिंदुस्तान को आजादी दिलाने वाली हिंदी आजाद हिंदुस्तान में छह दशकों बाद संख्या में आगे होकर भी अंग्रेजी का स्थान नहीं ले पायी है. कहां तो हम इसे संयुक्तराष्ट्र में खड़े देखना चाहते थे. पर अभी तो ये अपने देश में संसद की दहलीज पर अपने सम्मान और राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए न्याय की आस में खड़ी है.
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